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अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारमनसानां तु वसुधैव कुटुंबकम्

Monday, December 28, 2009

इस जमाने के अन्दर तो जमाने बहुत हैं



अनजान शहर में मिले खजाने बहुत हैं
खेल किस्मत को अभी दिखाने बहुत हैं

हर कदम टूटते हैं सैकडो दिल यहाँ
टूटे बिखरे दिलों के अफ़साने बहुत हैं

कुर्सी के पिछे दौड़कर सभी बावले हुए
इक नाजनीन के देखो दीवाने बहुत हैं

नक़ाब बदल बदल कर जो करते हैं घात
उनको ढुढेंगे कहाँ जिनके ठिकाने बहुत हैं

शायद चलती रहे महफिल देर रात तक
तेरे सामने साकी अभी  पैमाने बहुत हैं

पत्थरों से मुलाक़ात अब रोज़ की बात है
आँखों ने भी बसाए ख्वाब सुहाने बहुत हैं

किस किस की दास्ताँ सुनोगे तुम 'सुलभ'
इस जमाने के अन्दर तो जमाने बहुत हैं

- सुलभ जायसवाल

Saturday, December 26, 2009

करोड़पति कन्या - मेरी पहली हास्य कविता


ये साल भी अब जाने जाने को है. वर्ष २००९ बहुत से रोचक, अद्भूत, जोखिम भरे दिन मुझे दिखा गए. इन सबसे ऊपर कुछ कठोर अनुभवों से साक्षात्कार हुआ. नौकरी, स्वरोजगार और महानगर की आपाधापी में कुछ खोया और बहुत कुछ पाया भी. आज कल बहुत राहत महसूस कर रहा हूँ. पिछले साल और इस साल जून तक आजीविका का संकट गहराया हुआ था. व्यक्तित्व निखारना और सतत संघर्ष करना मुझे शुरू से पसंद है, हर साल के अंत में एक बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में ठोस कार्ययोजना बनाना मेरी प्राथमिकता होती है. दोस्ती, रिश्तेदारी, दुनियादारी और पर्यटन में मैं बहुत मशरूफ रहता हूँ. शायद यह भी एक कारण है धीमे गति से लक्ष्य की और बढ़ना. मगर मैं खुश हूँ मेरे चाहने वाले दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं. मैं भी संचार के विभिन्न माध्यमों से रिश्तों की उष्मा बनाये रखने की कोशिश करता हूँ. इस साल की उपलब्धि है "सयंमित रह कर कैसे सूझबूझ से निर्णय लेने चाहिए ये सब मुझे सिखने को मिला..." और अपने राज्य बिहार में एक बड़े अस्पताल और एक व्यावसायिक प्रशिक्षण अकादमी की स्थापना हेतु एक समिति से जुड़ गया. मानव ही इश्वर है, और मानव सेवा मेरा धर्म  इसी सूत्र पर जीवन संघर्ष और सफलताओं का दौर चलता रहे. परमेश्वर से कुछ ऐसी ही कृपा चाहता हूँ.





चिटठाजगत  में यूँ तो मैं पिछले साल जुड़ गया था. ब्लोग्वानी में इस साल अगस्त माह में शामिल होकर नियमित ब्लोगरी की. जहाँ जरुरत समझा वहां बहस भी किया.  और आप सभी का भरपूर स्नेह और कुछ संस्थानों से मान सम्मान पाया. चाह तो रहा हूँ की बहुत सारी बाते बता दूँ, लेकिन लम्बी पोस्ट लिखने के पक्ष में नहीं हूँ. आजकल ग़ज़ल सिखने और कहने में जोर है. लेकिन मैं मूलतः हास्य व्यंग्य विधा का कवि  हूँ (क्षमा कीजियेगा जब तक आप मान रहे है तभी तक मैं कवि हूँ ). आज से 9-10 साल पूर्व मैं दैनिक अखबारों और मासिक पत्रिकाओं में रचनाये भेजता था. अधिकांश अस्वीकृत कर लौटाई जाती थी. जिस दिन मैं छपता लौटरी जीतने जैसी ख़ुशी होती...

आज सुनिए मेरी पहली हास्य कविता...(साल 2001 में रचित)

 नयी कमीज पर खुशबू छिड़का
सज धज कर नए जूते पहना

तैयार होकर जैसे ही
मैं निकला घर से बाहर
पिताजी ने रास्ता रोका पास मेरे आकर

मुझसे बोले - बेटा अब तो तू बड़ा हो गया है
कद में मेरे सामने खड़ा हो गया है
अपने भविष्य की चिंता क्यों नहीं करता है
दिनभर
सिर्फ आवारागर्दी करता है
क्या तू तरक्की नहीं चाहता है
यूँ ही घर में बेकार रहना चाहता है
अरे! अपने बाप की इज्ज़त का कुछ तो ख्याल कर
जब पढ़ाई लिखाई छोर दी है
 तो कोई अच्छा काम कर.

और सुन ये लेखन वेखन का चक्कर छोड़ दे
इससे नहीं होगा तेरा भला
जा किसी धंधे में जाकर
हाथ पैर चला.

मैं बोला - पिताजी आप मुझे नाहक डांट रहें हैं
मेरे सुन्दर भाग्य को क्यूँ काट रहे हैं.
आप फिकर मत करिए
मेरा भविष्य है रंगीन
करोडपति बनने में बचे हैं कुछ ही दिन.

पिछले साल कालिज के नववर्ष समारोह में
जब मैंने प्रेमरस से भरा एक गीत गाया था
तब एक करोडपति कन्या का
दिल मुझ पर आया था.

पहली मुलाक़ात से ही कायल है
अब मेरे इश्क में घायल है
बहुत बड़े घर की बेटी है
दिखने में सुन्दर, दिमाग की मोटी है
मैंने भी उसे यह बता दिया
तुम्हे ही जीवन संगिनी बनाऊंगा
यह भरोसा जता दिया

अब बस आपको भी
अपना फ़र्ज़ निभाना है
एक दो चक्कर उसके घर के लगाना है
विवाह पूर्व के लड्डू बांटकर
एक रस्म निभाना है

जल्द ही वो बहु बन कर
घर आपके आएगी
साथ में माल मत्ता
पूरा लाएगी

अपनी किस्मत तो एकदम बुलंद
दिखती है
सब कुछ है हाथ में बना बनाया तैयार
बाईगोड कन्या तो है मेरे सर पर सवार

पिताजी टाइम हो गया
वो इंतज़ार में होगी
उससे मिलने जाना है
नयी फिलम आयी है
सिनेमा भी जाना है.


- सुलभ जायसवाल



Saturday, December 19, 2009

वो हंस दिए हमारी नादानी देखकर - एक कचोटती ग़ज़ल






हैरत में हैं लोग सचबयानी देखकर 
 दो गवाह और झूटी कहानी देखकर  


लिख सजा बेगुनाह को कलम है शर्मशार 
फैसले हुए हैं  कागज़ कानूनी देखकर   


ख्वाहिशों कि उड़ान अभी बाकी है बहुत 
मियाँ घबरा गए ढलती जवानी देखकर 



जाने क्या देखकर जाने क्या सोचकर  
फूल मुरझा गए सख्त निगरानी देखकर  


वहां न कोई भेड़िया था न कोई दरिंदा    
गुड़िया रोई थी चेहरा इंसानी देखकर  


खालिश डिग्री दिखाकर मांगी थी नौकरी
वो हंस दिए हमारी नादानी देखकर 


सुबह चल निकला था घर से प्यासा ही
राहत मिली अब रस्ते में पानी देखकर 
***


मुझे माफ़ कीजिये ! मैं कोई शायर नहीं हूँ 
शे'र पढता हूँ आपकी मेहरबानी देखकर


- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'



Wednesday, December 16, 2009

चित्र कविता - 2 (एक ग़ज़ल)

पिछले दिनों नीरज जी की पोस्ट में यह चित्र देखा था. बहुत कुछ कह रहें है ये सजीव चित्र. इसे देखकर स्वतः ही लेखनी चल पड़ी
हँसते बोलते कहीं खो जाओ ये अच्छा तो नहीं है
अपने मन को बस दुखाओ ये अच्छा तो नहीं है

मैं जानता हूँ मेरी जाँ मैं तुमसे दूर हूँ बहुत
सोचकर यही तुम घबराओ ये अच्छा तो नहीं है

दिल तुम्हार नाजुक है यह मेरा दिल समझता है
याद करके धड़कन बढाओ ये अच्छा तो नहीं है

सफ़र से लौटूंगा जब भी पास तुम्हारे ही आऊंगा
इंतजार में आंसू बहाओ ये अच्छा तो नहीं है

Friday, December 11, 2009

टिप्पणी कीजिये खूब कोई शरारत ना कीजिये - ग़ज़ल


जैसा की आप सभी जानते हैं पिछले एक महीने से अपने प्यारे ब्लॉगजगत में कुछ उलजलूल हरकतें और अनावश्यक बहसे हुई हैं. दुखी होकर मैंने एक Post जारी किया था "शान्ति के लिए यह सन्देश आत्मसात करें " बहुतों ने इसकी सराहना की तो कुछ ने असहमति जताते हुए अपना पक्ष रहा जवाब में मैंने भी यथोचित बहस " मानवता के दुश्मन ब्लोगिंग से दूर रहें." कर मामले को नतीजे पर पहुंचा कर सभी से जिम्मेदार लेखन की अपील की. 

एक खबर सुन पढ़कर आज फिर मर्माहत हो गया हूँ. अब क्या करूँ न चाहते हुए भी आज एक  ग़ज़ल (अपने सतरंगी अंदाज से अलग) कुछ इस तरह कहना पड़  रहा है - 




इजहारे- खुराफात की  ज़हमत ना कीजिये  
खो जाये अमन-चैन ऐसी जुर्रत ना कीजिये  


जब ठेस लगे दिल पर शिकायत दर्ज कीजिये 
बहस कीजिये खुल कर अदावत ना कीजिये 


कलम चलाने के लिए यहाँ मुद्दे भरपूर हैं 
महज दिखावे के वास्ते खिलाफत ना कीजिये 


ये भारत वर्ष है अपना गौरवशाली हिन्दोस्ताँ
जाति-धरम के नाम पर सियासत ना कीजिये



जरुरी नहीं जो दिखता है वो ही लिखता है  
इस्तकबाल लाजिमी है इबादत ना कीजिये 


ब्लॉगरी कोई खेल नहीं बस इतना ख्याल रहे  
टिप्पणी कीजिये खूब कोई शरारत ना कीजिये 

- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'  

Sunday, December 6, 2009

राह चलते एक छोटी सी ग़ज़ल




आंधियां जब तेज रही थी
टहनियों में खलबली थी

दरख़्त वही जगह पर रहे
जड़े जिनकी खूब गहरी थी

खुद को घायल पाया हमने
हुस्न से जब नज़र मिली थी

एक मुलाक़ात में दिल दे बैठे
नाजनीन वो  बड़ी हसीं थी 

सुबह तक डूबा रहा सूरज
जाड़े की एक रात बड़ी थी

सब ने  अपने  होश गंवाये 
ऐसी तो उसकी जादूगरी थी 

तंग गलियों से जब मैं निकला
देखा तब  एक सड़क खुली थी


- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी' 
(लेखक को gazal बहर की जानकारी का अभाव है)

Saturday, November 28, 2009

मेरी याद में देखना परीशाँ तुम होगे - ग़ज़ल

भी हाल ही में मेरे किसी शुभचिंतक ने मुझे मुफ्त की सलाह बांटने पर अपनी नाराजगी जाहिर की है. मैं परेशान, आख़िर मान लिया की गलती मेरी ही है. जाने अनजाने कुछ शे' लिखे चले गए. आज की यह ग़ज़ल उसी शुभचिंतक के नाम पेश है -






अपनी जमीं के वास्ते आसमां तुम होगे
करोगे जुर्म कोई तो गवाह तुम होगे

बातबात पे ऐब ढूंढ़ना अच्छी बात नहीं
आइना जब देखोगे पशेमाँ तुम होगे

सलाह लाख दुरुस्त हो फिजूल मत बांटो
बदनाम एक दिन ख्वामखाह तुम होगे

फूलों के बीच बैठे हो काँटों से दिल लगाओ
मुमकिन है इस बाग़ के बागबाँ तुम होगे
ये माँ की दुआएं हैं कभी साथ न छोड़ेगी
साया तुम्हारा होगा वहां जहाँ तुम होगे
अपने माज़ी को हम भुला नहीं पाये हैं
मेरी याद में देखना परीशाँ तुम होगे ॥

(पशेमाँ = शर्मिंदा, माज़ी = अतित )

- सुलभ

Thursday, November 26, 2009

भारत और आतंकवाद - क्षमादान अब त्यागो


(1)

कभी घुसपैठ कभी जेहाद आतंकवाद
लगे हैं सबके सब करने भारत को बरबाद

भारत को बरबाद रोज हो रहा ख़ूनी खेल
ढुलमुल विदेश नीति की देखो रेलमपेल

हमे बचाया मेजर संदीप ने देकर अपनी जान
करकरे, काम्टे, शर्मा और कितने वीर जवान

कितने वीर जवान अभी और शहीद कहलायेंगे
क्या खौफ के साये में हम दिवाली ईद मनाएंगे

कह 'सुलभ' कविराय क्षमादान अब त्यागो
समय रहते आतंकवाद को जड़ से मिटादो॥

(2)











ये कैसी लड़ाई है कैसा यह आतंकवाद
मासूमो का खून बहाकर बोलते हैं जेहाद

बोलते हैं जेहाद अल्लाह के घर जाओगे
लेकिन उससे पहले तुम जानवर बन जाओगे

बम फटे मस्जिद में तो कहीं देवालय में
दुश्मन छुपे बैठे हैं आतंक के मुख्यालय में

आतंक के मुख्यालय में साजिश वो रचते हैं
नादान नौजवान बलि का बकरा बनते हैं

रो रहा आमिर कासब क्या मिला मौत के बदले
अपने बुढडे आकाओं से हम क्यों मरे पहले ॥

- सुलभ जायसवाल सतरंगी

Monday, November 23, 2009

सतरंगी परिभाषा - 'सपने', 'वक़्त' और 'मौत'

कल मन बड़ा दार्शनिक हो चला है। कहीं जल्दी ही बुढापा न आ जाए। वैसे भी आदरणीय श्री राज भाटिया जी मुझे बुजुर्ग सोच वाला नौजवान मानते हैं। तीन क्षणिकाएं हैं। तीनो को एक साथ यहाँ रखकर आज सतरंगी परिभाषा की श्रिंखला को यहीं समाप्त करता हूँ...

(9)


विकल्पों
से भरे जीवन में
जो पा लिया वो अपने हैं
जिनको पाना बाकी है
वही 'सपने' हैं

(10)

'वक़्त' आते-जाते साँसों का एक पुलिंदा है
यही सबसे बड़ी पूँजी है जिसकी
कमाई से आदमी जिंदा है
और जिसने गवांया इसको
वो
शर्मिन्दा है

(11)

'मौत' बलखाते जीवन का
अवसान है
किसी के नही होने का
प्राकृतिक प्रमाण है

- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'
(अपनी प्रकाशनाधीन पुस्तक सतरंगी फिलोसफी से चुने हुए कुछ ख़ास शब्द)

Saturday, November 21, 2009

मानवता के दुश्मन ब्लोगिंग से दूर रहें.

"हम मानवता के रक्षक हैं."

मैंने यह पोस्ट सिर्फ इसलिए लगाई है की ब्लॉग जगत में (नित्य बढ़ते इन्टरनेट ज्ञान कोष में) ज्यादा समय हम अपना ज्ञानवर्धक आलेख(ऐतिहासिक, भोगोलिक, वैज्ञानिक, धार्मिक कुछ भी हो सकता है) पढने लिखने पर व्यतीत करें। साथ ही भाषा सुधार, साहित्य, हास्य-विनोद, मनोरंजन में भी बिताएं. ऐसा इसलिए की ब्लोगिंग कोई खेल नहीं है. मेरे अधिकाँश ब्लोगर मित्र भी ऐसा ही चाहते हैं. और तभी मैं प्रेरित हुआ ऐसी पोस्ट लगाने पर. ये तो मेरी बात हुई.

अब टिप्पणी में किसी ने मुझे कुछ प्रश्नों के उत्तर मांगे है। प्रश्न और उत्तर दोने लम्बे हैं इसलिए न चाहते हुए भी मुझे पुनः: पोस्ट लगाना पर रहा है. जबकि आज की शाम के लिए एक ग़ज़ल शेडूलड है. खैर प्रश्नों को देखें...

1) निरर्थक बहस - यह कैसे तय होगा?
2) धर्म विरोधी - यदि कोई लगातार आपके धर्म को लेकर अनर्गल प्रचार करे, तब कब तक टिप्पणी नहीं करेंगे? कोई समय सीमा?
3) अभद्र, अश्लील - ये कौन तय करेगा कि क्या अभद्र है और क्या अश्लील?
4) रोषपूर्ण भाषा, विचार, वक्तव्य - इसका भी कोई मानक पैमाना नहीं है।
"तटस्थ" रहना कुछ समय के लिये तो ठीक है, लेकिन इतिहास ऐसे लोगों के अपराध भी गिनता है… कि उन्होंने "वक्त" पड़ने पर तटस्थ रहकर खुद का और समाज का कितना नुकसान किया है।

एक अदना सा लेखक हूँ सरल उत्तर दे सकता हूँ - (माफ़ कीजियेगा तर्कपूर्ण, रोष पूर्ण, अभद्र और अश्लील उत्तर देना आज तक किसी ने मुझको सिखाया ही नहीं. हिन्दुस्तान के तीन स्कूलों में पढ़ चुका हूँ. पहला सरस्वती विद्या मंदिर तीसरी कक्षा तक, दुसरा एक पब्लिक स्कूल सातवीं कक्षा तक, तीसरा एक सरकारी स्कूल 12वी तक. तीनो ही आज के पिछड़े राज्य बिहार से. सुना था १९७० से पहले बिहार स्वर्ण प्रदेश था. मैं तो अस्सी के बाद जन्मा हूँ. )

1) निरर्थक बहस - यह कैसे तय होगा?
- यह कभी कोई व्यक्ति तय नहीं कर सकता. इसलिए निरर्थक बहस होता रहेगा. अपने विवेक के अनुसार जिस व्यक्ति को जैसा महसूस हो वो वैसा ही करेगा. अगर निरर्थक लगेगा तो तटस्थ हो जायेगा, और सार्थक लगेगा तो बहस जारी रहेगा. अनंतकाल तक जारी रह सकता है क्योंकि हमारे आप जैसे मनीषियों के पास तर्कों/कुतर्कों का अक्षय भण्डार है. और इसी दिव्य मारक शस्त्र से किसी भी बहस/मुद्दे (सार्थक/निरर्थ कुछ भी..क्योंकि तय नहीं है..?) को अनंत आकाश तक उठाया जा सकता है.

2) धर्म विरोधी - यदि कोई लगातार आपके धर्म को लेकर अनर्गल प्रचार करे, तब कब तक टिप्पणी नहीं करेंगे? कोई समय सीमा?
- धर्म निहायत ही निजी मामला है. फिर भी यदि कोई आस्था के प्रतीकों (देवालयों, मंदिर, मस्जिद गिरजा घर इत्यादि / शास्त्रों, गीता, पुराण, कुरआन इत्यादि / धरोहरों जातीय या धार्मिक निशानिया, दस्तूर, परंपरा, प्रथा, रिवाज इत्यादि) पर प्रहार करता है तो यह धर्म निरपेक्ष राष्ट्र में अपराध की श्रेणी में आता है. इसका प्रतिकार आवश्यक है. और सजा का भी प्रावधान होना चाहिए.

3) अभद्र, अश्लील - ये कौन तय करेगा कि क्या अभद्र है और क्या अश्लील?
यहाँ कोई मठाधीश तो है नहीं जो यह तय करेगा फिर भी मैं यही कहूँगा इन्टरनेट सार्वजनिक मंच है. सीधे सीधे अभद्र या अश्लील कहने से पहले दायरे सीमित कर ले की किसे कहा जा रहा है और क्यों कहा जा रहा है. क्योंकि आपके घर में, बच्चे, महिलायें, बुजुर्ग सभी साथ रहते हैं. इस तरह के कार्य. बंद दरवाजे में, मेरा मतलब पासवर्ड प्रोटेक्टेड पृष्ठों पर खुल कर कर सकते हैं. कोई मनाही नहीं है.

4) रोषपूर्ण भाषा, विचार, वक्तव्य - इसका भी कोई मानक पैमाना नहीं है।

- आज तक वैज्ञानिक, मानव और मानव दिमाग का कोई पैमाना नहीं ढूंड पाए तो किसी के विचार या वक्तव्य का पैमाने के बारे में सोचना ही बेमानी है. रोषपूर्ण भाषा से मेरा मतलब था तीव्रता उत्पन्न करने वाली आवाजों से. जब आप मोहल्ले में किसी से झगडा करते हैं तो अक्सर अडोस पड़ोस के लोग कहते हैं. इस तरह की भाषा इस्तेमाल मत करो. हाँ वैचारिक और जरुरी वाद विवाद या लड़ाई में भी ऐसा कहा जा सकता है. क्योंकि बच्चओं पर गलत असर पर सकता है. ऐसा मैं नहीं हमारा संविधान / हमारा समाज / हमारी सरकार भी कहती है. ब्लॉग जगत अपना समाज जैसा ही है. इसमें शान्ति बनाने की बात कहना या निवेदन करना कोई अपराध नहीं एक युक्तिसंगत पहल है. हमारे सरकारी सदन में भी स्पीकर महोदय ऐसा निवेदन जरुरत पड़ने पर हमारे सरकारी सदस्यों से करते रहते हैं.

"तटस्थ" रहना कुछ समय के लिये तो ठीक है, लेकिन इतिहास ऐसे लोगों के अपराध भी गिनता है… कि उन्होंने "वक्त" पड़ने पर तटस्थ रहकर खुद का और समाज का कितना नुकसान किया है। अगर ये सवाल है (या नही) तो मेरा जवाब ये है ....

उपरोक्त कथन से मैं पूर्णतया सहमत हूँ. राष्ट्रकवी दिनकर जी मेरे आदर्श व्यक्तियों में से एक है. तो आप समझ सकते हैं की मैं भी एक राष्ट्रभक्त हूँ और हिन्दू(सनातन संस्कार में रहने के कारण) वसुधैव कुटुम्बकम, सर्व धर्म समभाव की नीतिओं का अनुसरंकर्ता भी हूँ. एक सामाजिक, विचारक और संवेदनशील प्राणी होने के नाते ही मैंने ब्लॉग लेखन में कदम रखना उचित समझा. सामाजिक समरसता कायम रखना मेरी प्राथमिकता इसलिए है की मैं बाधारहित अधिकाधिक ज्ञानार्जन और सामूहिक मनोरंजन चाहता हूँ. तनाव भरे वातावरण में यह कार्य आसान नहीं रह जाता.

जरुरत पड़ने पर मैं भी जवाब देता हूँ. (बहुत जरुरी जब लगता है. व्यर्थ में मौके नहीं ढूंडता रहता हूँ किसी को भी उल्टा सीधा जवाब देने के लिए.) आज ही एक टिपण्णी मैंने अनिल पुसदकर जी के समर्थन में किया था. लेकिन वहां विषय धार्मिक या जातीय न होकर. अध्यात्मिक/मानवीय (आस्तिक और नास्तिक) टाइप का था.
लिंक यहाँ है. https://www.blogger.com/comment.g?blogID=1364552172608471144&postID=6329419992828844155

साम्रदायिक सद्भाव बिगारने वालों को जवाब मैं भी देता हूँ. एक हिन्दू होने की वजह से नहीं. बल्कि इस धर्म निरपेक्ष देश का नागरिक होने के नाते. हाँ अंतर इतना ही है. की मैं शांतिप्रिय स्वभाव होने के वजह से एक बार टिप्पणी करता हूँ. किसी अन्यब्लोगर नागरिक के पास समय ज्यादा होता है सो वे टिपण्णी और पोस्ट की बौछार करते रहते हैं.

अभी हाल ही में कहीं गलत महसूस होने पर एक टिपण्णी मैना कुछ ऐसा किया था.. यहाँ फिर से दोहरा रहा हूँ..

"इस मामले पर पहले भी मैंने एक टिपण्णी किया था. और मुझे फलाना जी ने एक संतोषजनक जवाब दिया था. जिसके मूल में यही पता चलता है की हमे (सीधे सादे लोग को) अक्सर चालु राजनेताओं और कुछ अवैज्ञानिक सोच रखने वाले उलेमाओं द्वारा मुसलसल(बार-बार) परेशान किया जा रहा हैं. अतः: विरोध उन असामाजिक तत्वों का अनिवार्य है जिनको हमने अपना नेता बना रखा है. यहाँ ब्लॉग पर तीव्र बहस करने की कोई जरुरत नहीं है. व्यर्थ के वाद-विवाद देखकर फिर दुखी हो आया हूँ.

इस ब्लॉग का टाइटिल पढ़कर मैं कुछ सिखने की जिज्ञासा से यहाँ आया था. यहाँ अन्दर देखता हूँ तो पता चलता है की उन्वान कुछ और है और मजमून दिशाहीन है. शायद हिंदी ब्लॉग जगत का स्वर्णकाल समाप्त हो गया है. ये सब T.R.P. का मामला लग रहा है. हमलोग पहले से ही टेलीविजन मीडिया वाले से परेशान हो चुके थे 'वे T.R.P. और नंबर 1 की दौड़ में कुछ भी पडोसने लग गए है.' अब ब्लॉग जगत में भी यही होने लगा है.

आप कहते हैं की "कुछ लोगों को उन्ही की भाषा में सिखाना जरुरी है" यह जानते हुए की वो सीखना नहीं चाहते. नफरत की भाषा से अगर सफलता मिलने की गुंजाईश है तो लगे रहिये. अपना अनुभव यही कहता है की सिरफ नुक्सान और हाहाकार ही मिलेगा. इस तुफैल में जो जरुरी बहस के मुद्दे हैं, वे कहीं गुम सी लगती है. उन पन्नों और कड़ियों को हाईलाइट करने की जरुरत है ना की कीबोर्ड पर व्यर्थ ही अपनी ऊर्जा गंवाने की.

यदि आपलोगों (मुआफी चाहूँगा किसी को जानता नहीं हूँ...) की यही मंशा(यही बहस, T.R.P. और नंबर 1 वाला) है तो ठीक है आप लोग लगे रहिये. मैं आईंदा इस ब्लॉग पर नहीं आऊंगा. जहाँ मेरी आत्मा आहत हो और जुबान में जहर फैलने का खतरा हो, उस स्थान से दूर रहने में ही भलाई है...."

नीली स्याही से लिखी उपरोक्त बातें मैं पहले ही कहीं और टिप्पणी के माध्यम से कह चूका हूँ. जिनको अक्ल है वो उनको सन्देश देने की जरुरत नहीं है. जो समझना नहीं चाहते हैं. उनको बक बकाने दीजिये. जब कोई अपने परोस में रहने वाले गुंडों को सुधार नहीं पा रहा है तो यहाँ पढ़े लिखे टेक्निकल खिलाड़ियों को कौन समझा सकता है. (छद्म नाम और चेहरे वाले से ब्लोगिंग में आप ख़ाक लड़ाई जीत पाएंगे). इसके लिए कोई साइबर कानून हो सकता है. कोई ब्लोगिंग में मानवता को ताक पे रखकर नेता बनना चाहता है तो बने. मूर्खों की फ़ौज ही उनको follow करेगी.

सिर्फ इसलिए हम तटस्थ रहना चाहते हैं और हमने "मानवता के रक्षक" वाला सन्देश बगैर किसी बेक लिंक के टीम ब्लोगवाणी को समर्पित करते हुए कल रात्री को दिया था.

कोई गलत होता है तो उसके लिए किसी भी समाज देश में क़ानून है और अदालत है. हमारे हाथ में कोई लाइसेंस नहीं है किसी को सुधारने का. हाँ एक चीज़ है मेरे पास वो है- समाज हित में सुन्दर, ज्ञानवर्धक और मनोरंजक पोस्ट जिसे मैं सप्ताह में दो एक बार अपने ब्लॉग पर जरुर टांग सकता हूँ.

जय हिंद.
---
अगली पोस्ट में मिलूँगा कोई ग़ज़ल या कविता लेकर. वही पुरानी सतरंगी वाली छवि में. अपने अजीज पाठकों को हुए व्यवधान के लिए पुनः क्षमा मांगता हूँ.

आपका ब्लोगर सहयात्री -
सुलभ

निचे की गई टिप्पणी का जवाब.......................
@प्रवीण शाह जी,


आपने मेरी साधारण सी बात को समझने का प्रयास किया. इस के लिए हमारा धन्यवाद स्वीकार करें.

आप कहते हैं, "ब्लॉगिंग का फायदा यही है कि यहां कोई संपादक नहीं है... अत: मन के अंदर चल रही बातें भी आ जाती हैं बाहर."

मैं कहता हूँ यहाँ ब्लोगर लेखक ही सम्पादक है और प्रकाशक भी. ये तो और अभी अच्छी बात है जब आप अपने मन के भाव को लिखते हैं, तो उसे तबतक कोई सुन(पढ़) नहीं सकता जब तक की आप उसे प्रकाशित न कर दे. यहाँ तो अच्छे मौके हैं अपनी भाव (मन में घुमरते विचारों) को पढ़ कर निरक्षण करने का, अपनी लिखी हुई भाषा और कथ्य कितना सटीक है, इसे समझने का . जब की गलियों और चौराहों पर आपको यह मौका नहीं मिलता. एक बार शब्द जबान से निकल गए तो निकल गए. भले ही आप कितना ही उत्साहित और क्रोधित क्यों न हो ब्लॉग पोस्ट को प्रकाशित करने के वक़्त पुरे होश में होते हैं.

एन, यही बात मैं पूछना चाहता हूँ की जब आप होश में होते हैं, एक लेखक की भूमिका में एक एक शब्द और वाक्य शुचिता से लिखते हैं, वर्तनी, व्याकरण का भी ख्याल रखते हैं. फिर सन्देश गलत क्यूँ हो जाता है? असामाजिक, असभ्य, अश्लील क्यों हो जाता है? दुसरे को नीचा दिखाने वाला क्यों हो जाता है? साफ़ जाहिर है की कुछ लोग जानबूझ कर अपनी लेखकीय प्रतिभा रूपी छेनी और तर्कों(कुतर्कों) के भार रूपी हथोड़े से व्यवस्था रूपी सुन्दर दीवार को गिराना चाहते हैं. ऐसा करना उन्हें रस (मजा) देता है. ऐसे ही कृत्यों पर सभ्य समाज को शर्मिंदगी महसूस होती है. चाहे वो अपना गाँव चौपाल हो या तकनीक से सज्जित अपना वैश्विक गाँव चौपाल (ब्लॉग जगत) हो. नुक्सान पुरे समाज का ही होता है. व्यक्तिगत और जातिगत बहस किसी से फोन, चैटिंग या ईमेल पर भी की जा सकती है. ओपन ब्लॉग पर ही क्यों..??

यहाँ कोई विवाद नहीं है, स्वस्थ ब्लोगिंग (लेखन) के जरिये कोई भी बहस नतीजे पर पहुँच सकती है. धर्म-जाति विरोधी,व्यक्तिगत आक्षेप या अभद्र अश्लील रोषपूर्ण भाषा प्रयोग करने से कुछ भी हाथ नहीं आने वाला. हाँ दंगे भड़कने का खतरा जरुर रहेगा.

आशा है इस प्रकरण पर अब कोई वाद विवाद नहीं होने चाहिए.

Friday, November 20, 2009

ब्लॉग जगत में शान्ति के लिए यह विजेट लगाएं



हम मानवता के रक्षक हैं...

मैं उन साइट्स और ब्लॉग को पढने और उनपर टिप्पणी करने से बचुंगा
जहाँ सस्ती लोकप्रियता के लिए धर्म-जाति संगत/ धर्म-जाति विरोधी,
निरर्थक बहस,व्यक्तिगत आक्षेप, अभद्र अश्लील रोषपूर्ण भाषायुक्त विचार
या वक्तव्य प्रस्तुत किये जाते हैं.



कोई समस्या होने पर इस इमेज से काम चलायें।
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सुरक्षा कवच: यह विजेट लगना जरुरी नही है। संदेश को आत्मसात कर लीजिये, सुरक्षा हो जाएगी।

Thursday, November 19, 2009

महफूज़ के नाम एक पत्र.


प्रिय महफूज़, अब तबियत कैसी है?

जिंदगी एक रेस ही तो है. अलग अलग उम्र में रेस के मैदान अलग अलग होते हैं. पिताजी (पिताजी जैसे लोग), अपना बेस्ट अनुभव बेटे को देना चाहते हैं.

आप ब्लोगिंग में बहूत मशरूफ रहते हैं. सिर्फ आप ही नहीं और बहुत से लोग इसमें अस्त-व्यस्त दिखते हैं. कमोबेश मैं भी उन्ही में से एक हूँ. इस ब्लॉग जगत की आभासी(आभासी नहीं, मेरा मतलब संवाद की आधुनिक तकनीक से सज्जित अपना वैश्विक गाँव चौपाल) सार्वजनिक मंच पर कहते सुनते अब तक(बहुत कम समय में) जिन लोगों से दोस्ताना रिश्ता विकसित हुआ है, उनमे से एक आप भी है. ऐसा मैं सिर्फ महसूस करता हूँ. क्योंकि ना ही मैंने आपको ज्यादा पढ़ा है और ना ही हमारे बीच संवादों का आदान-प्रदान हुआ है. ये तो सिर्फ महसूस करने की बात है और मेरे लिए यही सुन्दर और सुखद अनुभूति है. अब आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए की मैं आपको पत्र क्यों लिख रहा हूँ. बाकी और भी ग़म(ख़ुशी) है इस जमाने में ब्लोगिंग के सिवाय.

असल बात सिर्फ इतना ही है की आपके पोस्ट के माध्यम से पता चला की आपकी तबियत खराब चल रही है. वायरल का क्या है दवा, उचित खान-पान और परहेज से चार-छ: दिनों में ठीक हो जायेंगे. मैं इस बात से ज्यादा परेशान हुआ की, कहीं आप मानसिक रूप से भी ज्यादा बीमार तो नहीं?. एक अच्छा लेखक जो सामाजिक सद्भाव और सहज मनोरंजन के लिए लिखता हैं उसके साथ सब ठीक ठीक ही गुजरे. ऐसी दुआ मैं सभी अच्छे लोगों के लिए करता हूँ. फिर संतोष हुआ की आप बिलकुल स्वस्थ ही हैं और आपकी मानसिक स्थिति भी सुदृढ़ है तभी तो आप अपनी पोस्ट सफलता पूर्वक प्रकाशित कर पायें हैं.

एक ब्लोगर सहयात्री के रूप में जब आपने मेरा पैगाम समझा था तब से आपका शुभेच्छु ज्यादा हो गया हूँ. पैगाम वही दोस्ती वाला "खाली जेब फिर भी दुनिया भर की मस्ती है; ये जो दोस्ती है एक विश्वास की कश्ती है". दोस्ती के नाम पर ही आपको एक सलाह दे रहा हूँ. यदि ज्यादा कोई दिक्कत नहीं है तो आप शादी कर लीजिये. सिर्फ इसलिए कह रहा हूँ की आप अकेलेरहते हैं और माता-पिता का भी साथ नहीं है. एक दोस्त के रूप में सौभाग्य से कोई जीवन साथी मिल जाये या जीवनसंगिनी के रूप में एक दोस्त मिल जाये तो सचमुच जिंदगी खुशगवार हो जाएगी. बाकी उंच-नीच, सम्पन्नता-अभाव, सफलता-विपत्ति इत्यादि, वेगैरह किसी के भी जीवन का अभिन्न अंग है.

एक बाद याद रखियेगा.. इस दुनिया में (दुनियादारी में) एक पिता-पुत्र का ही एक ऐसा सम्बन्ध है जिसमे पिता अपने पुत्र को स्वयं से बड़ा देखना चाहता है. बाकी करीबी रिलेशन में भी ऐसा भाव नहीं मिलेगा. एक माँ है जो अपने बच्चे को हमेशा स्वस्थ और प्रसन्नचित देखना चाहती है. आर्थिक और सामाजिक तरक्की उसके दिमाग से बाहर की चीज़ होती है वह(माँ) इसकी कामना अपने बेटे से कभी नहीं करती.

यदि पिता के बाद कोई है तो वह आपकी पत्नी हो सकती है जो आर्धान्गनी बनकर एक सखा के रूप में आपको आगे बढ़ते देखना चाहेगी. बाकी सब मायाजाल है. आभासी अतिरेकता से बचिए. ब्लोगिंग में टॉप कोई नहीं है और न ही हो सकता है. परीक्षा में अधिकतम अंक पाने का यह मतलब नहीं है की फलां शख्श उस विषय का सबसे बड़ा ज्ञानी है. आपकी चिरस्थायी उपलब्धि एकमात्र यही है की कुछ अच्छे और सच्चे लोग आपको दिल से टॉप मानते हैं. बस उनके दिल में बने रहिये. हाँ लिखना कभी मत छोड़ना.


आपका मित्र (मित्र नहीं एक आभासी सहयात्री)

सुलभ

19 नवम्बर २००९
नोट: टिपण्णी बॉक्स में असुविधा होने पर मैंने यह लंबा संदेश सहज प्रतिक्रया में यहाँ post किया है। कृपया इसे विवाद का विषय न बनाए।

Sunday, November 15, 2009

कभी नाम था इज्ज़तदार में (शायद एक ग़ज़ल)

यह भी अपने आप में एक ग़ज़ल है जिसे मैंने मोहल्ले में रहने वाले एक बुजुर्ग के लिए लिखा है. और लिखा है देश के उन तमाम बुजुर्गों के लिए जो अकेलेपन का दंश झेल रहे हैं.

कभी नाम था इज्ज़तदार में
अब अकेला बचा हूँ घरबार में

आप दरवाजे पर आये होंगे
बेहोशी में था मैं बुखार में

बेटे सारे पराये हो गए
हद से ज्यादा दुलार में

दुश्मन कौन था मुझे नही पता
धोखा खाये दोस्ती की आड़ में

मैंने ख़रीदा था दुकाँ मैंने बेचा
फुजूल के चर्चे हुए बाज़ार में

एक अदद लाठी का सहारा है
जी रहा हूँ मौत के इंतजार में


रहनेवाला कोई नहीं तो क्या सोचना
जंग लगती रहे पुरखों के दीवार में ||

- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'

Tuesday, November 10, 2009

यह चिट्ठी तो अनमोल है



मेरे विद्यार्थी जीवन में और आज नौकरी में भी पत्र और पत्रलेखन की महत्ता क्या मायने रखती है यह सिर्फ मैं ही समझ सकता हूँ. मेरे व्यक्तित्व विकास और लेखकीय सुधार में डाकखाने (विशेषरूप से डाकघर अररिया) का बड़ा योगदान है. अभी कुछ दिनों पहले (27-अक्तूबर-2009 को) मैंने अपने शहर अररिया से एक पोस्टकार्ड प्रेषित किया तो पिछले कुछ वर्षों के डाक घरो के अनंत चक्कर सहसा ही जेहन में आ गए. मैं बहुत खुश हूँ की अपने मित्रो, पत्रमित्रो, विभिन्न सम्पादकों और अन्य प्रियजनों के सैकडो ख़त मेरे पास सुरक्षित हैं. इनको पढना एक अद्भूत अहसास है.

मुझे ठीक ठीक यह तो याद नहीं है मैंने अपना पहला ख़त कब लिखा था पर इतना जरूर याद है की मैंने अपने प्रिय मामा जी श्री देवव्रत चौधरी, दार्जिलिंग (पं.बंगाल) को लिखा था. उनदिनों स्कूलों में पत्र लेखन की सैद्यान्तिक शिक्षा नियमित दी जाती थी परन्तु व्यावहारिक ट्रेनिंग घर के ही किसी बड़े बुजर्गों के माध्यम से हो पाता था. जब मैंने एक सादे कागज़ पर पत्र लिख कर अपनी माँ को दिखाया तो वो खुश होकर मुस्कराई जरूर लेकिन मुझे प्रथम पंक्ति में ही गलती कह कर सुधार करने को कह दिया. माँ ने कहा बेटा "प्रिय मामा जी" के जगह पर "आदरणीय मामा जी" लिखो, यह चिट्ठी तुम अपने किसी साथी को नहीं लिख रहे हो. जिस प्रकार मैं आदरणीय पिताजी, चरण स्पर्श लिखती हूँ तुम भी वैसे ही लिखो वे बड़े हैं . अपनी मम्मी के इस प्रकार सार्थक आलोचना किये जाने पर मैं उनदिनों दुखी हो गया था. मेरा बाल मन इसलिए चिडचिडा गया था कि मुझे फिर से अक्षर बनाकर पूरा ख़त लिखना पड़ेगा और गुलाबी लैटर पैड का एक और पन्ना जियान(नुकसान) होगा. पर आज गर्वित होता हूँ की माँ ही मेरी पहली गुरु है.


थोड़े और बड़े हुए तो अपने विद्यार्थी जीवन में घटित एक प्रसंग को मैंने पत्रिका सुमन सौरभ 'कोशोरो की सचेतक पत्रिका' जो की इसका स्लोगन है यह मासिक पत्रिका मेरी सर्वप्रिय पत्रिका होती थी. इसके एक स्तम्भ "मेरे जीवन की रोचक घटना " के अर्न्तगत पत्र लिखकर सम्पादक महोदय को भेजा था। दो तीन माह बाद अपना नाम पत्रिका में देखकर मैं अगले कई दिनों तक मुस्कराता रह गया

कक्षा दसवीं और ग्यारहवीं तक पत्र लेखन का शौक पूरी तरह परवान चढ़ चुका था. पत्रमैत्री के माध्यम से भारत के चार राज्यों में अनेक चिट्ठीओं का आदान प्रदान हो चुका था. कुल छ: दोस्तों में मुझे रामनगर, पश्चिम चंपारण(बिहार) के निखिल गौतम का पत्र विशेष प्रिय था. वे मुझसे एक साल जूनियर थे परन्तु पत्र लेखन की विधा में वे मुझसे आगे थे ऐसा मैं मानता हूँ. निखिल का पत्र पढना मेरे लिए अलौकिक ख़ुशी का अनुभव करना जैसे होता था. उसकी नज़र में मेरी चिट्ठी दिल को छूने वाली और मेरी छवि एक स्नेहमयी दोस्त की है ऐसा उसके जवाबी चिट्ठे से प्रतीत होता था. लेकिन सच्चाई यही है की मेरी पंक्तियों में हिंदी की अनेक गलतियां होती थी और मैं निखिल को सर्वश्रेष्ठ इसलिए भी मानता था की उसका लिखा एक एक शब्द और पैरा त्रुटी रहित होता था. उसकी लेखनी प्रवाहमय व हिंदी के स्पष्ट शब्दों से सजी होती थी बहुत ढूँढने पर एक-आध गलतियां किसी को मिल भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है. कहना पड़ेगा की मेरी लेखकीय सुधार में निखिल का भी योगदान है.

चिट्ठीयां जीवनदायिनी दवा की तरह असरदार होती है. दिल से लिखी चिट्ठी मृतप्राय जीवों में भी नयी जान फूंक देती है. एक पुरानी रोचक घटना है - मेरी फुफेरी बहन की चचेरी दीदी (वे सब परिवार में साथ रहते थे ) शादी के 5 महीने बाद जब ससुराल से अपने मायके आई तो फिर कोई विदाई नहीं हुई. रिश्तेदारी में किसी बेईज्ज़ती के मुद्दे पर माता-पिता सास-ससुर में ठनी हुई थी. 6 महीने बीतने पर भी दोनों पक्षों में कोई सहमती नहीं बनी इधर लड़की के पिताजी अड़े हुए थे "मैं थोड़े न अपनी बेटी को ससुराल पहुंचाऊंगा, वे आयें और विदाई ले जाए". कोई हल न होता देख दीदी (दुःख और वेदना से भरी एक पत्नी) ने एक ख़त अपने पति परमेश्वर के नाम लिखा. सप्ताह दस दिन बाद ही अचानक से जीजाजी अपनी पत्नी को लेने अपने ससुराल आ पहुंचे. घर के सभी बड़े लोगों को आश्चर्य में डालते हुए वो विदाई ले गए. कुछ दिनों बाद ही जीजा ने चिट्ठी को सारा श्रेय देते हुए यह बात अपनी साली के समक्ष रखा था. सम्बन्ध मधुर हो जाने के बाद मुझे यह सब अपनी फुफेरी बहन से पता चला.

आज इन्टरनेट/मोबाइल के जमाने में पत्र लिखना कितना जटिल कार्य लगता है. मैं फिर भी कोशिश करता हूँ की महीने में दो-एक चिट्ठी छोटे भाई बहनों/ या रिश्तेदारों को लिखा जाये. इससे कोई इनकार नहीं कर सकता की संबंधो की उष्मा बनाए रखने में एक चिट्ठी सशक्त भूमिका निभाती है. कभी आप पुराने खतों को अकेले में पढ़कर देखना ये यादों के समंदर में गहरे डुबो देगी जब आप बाहर आयेंगे तो देखेंगे की आपके हाथों में कुछ ऐसे मोतियाँ हैं जिनकी कीमत सिवाय आपके कोई नहीं समझ सकता. आप बरबस कह उठेंगे यह चिट्ठी तो अनमोल है.



आख़िर में एक शे...

मेरे ज़नाजे पर कफ़न नहीं चिट्ठियों की चद्दर हो
मेरी ख्वाहिश है मेरे कब्र के नजदीक डाकघर हो
- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'

Monday, November 9, 2009

सतरंगी परिभाषा - 7 "सफलता" 8 "असफलता"

सफलता -
"बहुत कुछ देने के बाद
बदले में
बहुत कुछ पाने के बाद
एक खुशी मात्र है "

असफलता -
"एक खुशी का पीछा करने के दौरान
रास्ते में मिली कुछ ठोकरें "

- सुलभ 'सतरंगी'

Sunday, November 8, 2009

सतरंगी परिभाषा - 6 "दोस्त"


बेमजा बेरौनक बेकार
और बदरंग है जिंदगी
बगैर किसी दोस्त के
जैसे कोई दावत
बिन शोरबा बिन गोश्त के

- सुलभ 'सतरंगी'

Saturday, November 7, 2009

सतरंगी परिभाषा - 5 "नफरत"

नफरत एक शैतानी कीड़ा है
जो खामोशी में पलती है
राह चलते खुशबुओं को
फैलने से रोकती है
अक्सर प्यार की बात सुनकर
अपना दम तोड़ती है

- सुलभ 'सतरंगी'

Friday, November 6, 2009

सतरंगी परिभाषा - 4 "दोस्ती"


खाली जेब फिर भी
दुनिया भर की मस्ती है
ये जो दोस्ती है
एक विश्वाश की कश्ती है

- सुलभ 'सतरंगी'

Wednesday, November 4, 2009

सतरंगी परिभाषा - 3 "प्यार"


प्यार मतलब देने का नाम है
किसी से भी मिले
तो समझो वरदान है
खुशी में भी छलक जाये
ये
वो बेशकीमती आंसू है
प्यार के दम से
तकलीफ
में भी मुस्कान है

- सुलभ 'सतरंगी'

Tuesday, November 3, 2009

सतरंगी परिभाषा - 2 "दिल"

दिल लगा तो लगा अरमानो की जीत हुई
दिल टूटा तो जिंदगी ही ठूंठ हुई
दिल की बात करो तो झूमता है मन
जब धड़कन नही तो कहाँ जीवन

Sunday, November 1, 2009

सतरंगी परिभाषा - 1 "जिंदगी"

जिन्दगी क्या हुई
जैसे
शतरंज की बिसात

जो दिमाग से चले
तो लगी शह
जहाँ दिल पे लिया
तो हुई मात

Tuesday, October 20, 2009

हिंदुस्तान जो की वादियों का देश है



अपना हिंदुस्तान जो की वादियों का देश है तो लीजिये कुछ पंक्तियां पेश हैं ...

वे देश मे अलगावादी की भूमिका निभाते हैं
खुद को एक समर्पित राष्ट्रवादी बताते हैं।

इस लोकतांत्रिक गणराज्य के, समाजवाद हिंदुस्तान के
स्वयम्भू साम्यवादी, जनवादी, मनुवादी, इत्यादि इत्यादि खुद को बताते हैं।

वैसे हमारा हिंदुस्तान सदियों से जकरा हुआ है,
ना जाने किन किन वादियों के बोझ से दुहरा हुआ है।

चुनाव मे जातिवादी,
नौकरी मे भाई-भातिजवादी,
वादियों मे आतंकवादी,

घाटियों मे उग्रवादी और
जंगलों मे नक्सलवादी।


हाय! हम और आप सिर्फ़ वादी और प्रतिवादी।

पाण्डेय जी कहते हैं इसके बाद भी एक वादी है जो सब पे भारी है
वो है बढ़ती हुई
आबादी॥


Friday, October 16, 2009

दिवाली में साम्य (क्षणिकाएं)




घर में श्रीमती के हाथो फूल-पत्ते गूँथ कर
श्रद्धा के सहारे लक्ष्मी को बुलाया जा रहा है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

बाहर श्रीमान के हाथो 'फुल पत्ते' पीस कर
संयोग के सहारे लक्ष्मी को बुलाया जा रहा है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~



~~~~~प्रकाशपर्व मंगलमय हो!~~~~~~

Saturday, October 10, 2009

सियासत में लूटेरों की गश्ती देखो तो ज़रा (Ghazal)



लहरों के ऊपर लड़ते कश्ती देखो तो ज़रा
जिंदगी-मौत के बीच मस्ती देखो तो ज़रा

दौड़ते हैं कदम बर्फ पर हाथों में बारूद लिये
दूर सरहद जज्बा-ए-वतनपरस्ती देखो तो ज़रा

साथ चलते बाशिंदों से ये कहाँ की नफरत है
बात बात पे जलते हैं बस्ती देखो तो ज़रा

हुस्न है; तो नाज़ नखरों के गहने भी होंगे
नासमझ दीवानों की ज़बरदस्ती देखो तो ज़रा

शहरों में आपाधापी किराये की छत के लिए
किसानों की जमीं है सस्ती देखो तो ज़रा

कौन
अपना रहनुमा यहाँ क्या हो मुस्तकबिल
सियासत में लूटेरों की गश्ती देखो तो ज़रा ||



(रहनुमा = Leader मुस्तकबिल = Future) [इस post पर आपकी प्रतिक्रिया]


लिंक विदइन

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जिंदगी हसीं है -
"खाने के लिए ज्ञान पचाने के लिए विज्ञान, सोने के लिए फर्श पहनने के लिए आदर्श, जीने के लिए सपने चलने के लिए इरादे, हंसने के लिए दर्द लिखने के लिए यादें... न कोई शिकायत न कोई कमी है, एक शायर की जिंदगी यूँ ही हसीं है... "