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अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारमनसानां तु वसुधैव कुटुंबकम्
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Sunday, February 27, 2011

बातें बिज़नेस की


जब किसी मरीज की तबियत मे कोई सुधार नही होता तब डाक्टर एक सलाह देते हैं जाईए किसी नए जगह पर कुछ दिन बिताईए नए लोगों से मिलिये, सब कुछ सही हो जाएगा. उदासियों के बादल छंट जाएंगे. कुछ भी खाना रुचेगा, अपने काम मे फिर से मन लगने लगेगा. मतलब आपकी जिंदगी खुबसूरत हो जायेगी. ये बात बिलकुल सही है मैने खुद पर आजमाया और सफल हुआ.

पिछले तीन चार सालों मे पढाई, मनोनुकूल नौकरी की तलाश, सुंदर भविष्य निर्माण के चक्कर मे आफिस और निवास के बहुत से जगह बदले. इस दौरान २०-३० के युवाओं  के बीच ज्यादा समय गुजरा. दिल्ली (एन.सी.आर) मे जो एक बात हर जगह देखने को मिली वो ये कि ‍ ज्यादातर युवा महानगरीय जीवानशैली मे खुद को परफेक्ट रखने की कोशीश में ‍‍संघर्ष कर रहे है. सैटेलाईट चैनलों के दिखावे, बहकावे और प्रिंट व टेलीविजन विज्ञापणों के मायाजाल में गिरफ्त हैं. जो बेरोजगार है ऐसा लगता है उनके सामने विकल्पों की भारी कमी है. वे परेशान हैं एक अदद जॉब के लिये. वे अपना रिज्युमे कुछ खास सेक्टरों मे ही भेज रहे हैं जैसे आई.टी. (सोफ्टवेयर, हार्डवेयर, नेटवर्किंग ), फाईनांस (बैंकिग, इंसोरेंश, शेयर ट्रेडिंग), कालसेंटर, बी.पी.ओ  और अंत मे कोई बात न बने तब सेल्स एंड मार्केटिंग. स्वयं का बिजनेस शुरू करने का जोश या ख्याल न के बराबर!

जो युवा जॉब मे हैं उनकी दिनचर्या मे भी मानो विकल्पों की भारी कमी है. ऑफिस से शाम में तो कभी रात नौ दस बजे तक बाहर ही डीनर एंजोय करते हुये  थक कर आएंगे. थके हुये न भी हों तो भी बहुत थके होने का अहसास कराएंगे. पी.जी. मे अथवा फ्लैट में साथ रहने वाले रूममेट्स से कुछ ऐसी चर्चा करेंगे. "यार शादी से पहले सेक्स जरूरी है... तुम्हारी कैसी चल रही है... हां सिर्फ मोबाईल पर बातें होती है देखें कब तक वो हां करती है..." वैसे शादी का मूड किसी का नही हैं... कोई कहता है "मैं भी जाब चेंज की सोच रहा हुं... दो साल का इक्सपीरिएंस होने वाला है... पैकेज यहां बढ़ती है तो ठीक वर्ना कंपनीयों की कमी थोड़े है.... पूणे से भी एक काल आई हुयी है..." कोई एम.टी.वी. रोडीज देखते हुये कहता है "तू एक बार ट्राई कर जिंदगी मे एडवेंचर का मजा ले... यहां साली नाइट शिफ्ट बी.पी.ओं मे क्या रक्खा है..." कभी ये सुनने को मिलता  "अरे तू खाली डिनर पैक कर लाया, बीयर नही लाया! साले आज तुम्हारी ट्रीप है भूल गया..." तो कभी किसी संडे की शाम, "आज बारह बजे तक सोया हफ्ते भर की थकान मिटाई फिर कपड़े सपड़े धोये, द चीकन लीकन(नॉएडा का एक रेस्टोरेंट ) वाले से लंच मंगवाया, लैपटोप पे वाल स्मिथ की मूवी इंडीपेंडेंस डे देखा. तुमने क्या किया सारा दिन..." "मैं तो ईवेंट पे गया था गुड़गावं एम्बीयेंस माल वहाँ रीयल एस्टेट की एक बडीं क्लाईंट से मिलना था. कंपनी ने मेरे को भेजा था डरते डरते प्रेजेंटेशन दे कर आया हूँ. अगर डील फाईनल हो गयी तो समझो तुम लोगों को जानी वाकर पिलाउंगा तुम लोगों ने तो सिर्फ नाम ही सुना होगा न..." "चल तू ज्यादा मत बोल मुझे भी  क्लाईंट ऑफ़र करते हैं... ...! " ... !!   

"और बॉस आपकी कैसी चल रही है?" किसी ने मेरे उपर ईशारा किया. (ये भी एक फैशन है अपने अगल बगल रहने वाले साथियों को संबोधित करने का ). "..अरे इनसे मत पुछो ये कवि आदमी हैं, देश को सुधारने की बात  करते हैं. कल नाईट में बस एक ग्लास बियर लेने के बाद ही शुरू हो गए. कोई सोसायटी संगठन बनाने की बात कर रहे थे. हमारे तो भेजे से ऊपर निकला गया. ये इंटरनेट पर कविता लिखते हैं. भइये  खुद को बदल डालो यही बहुत है. देश तो भगवान् भरोसे चल रहा है जैसे कि अपनी जॉब पता नहीं कब निकाल दिया जाये."  किसी दुसरे ने टोका "यू मीन ब्लोग? येस येस! ...गुड डैट इज गुड हाबी. आई एम अलसो राईटिंग ब्लोग. माई सबजेक्ट इज स्मार्ट एंभेस्टमेंट इन फलाक्चुयेट  मार्केट."

मैं जवाब में बस इतना ही कह पाया "तुमने ठीक कहा खुद को बदल डालो यही बहुत है, देश अपने आप सुधर जायेगा. वैसे मेरा यहाँ खूब मन लग रहा है. सोफ्टवेयर कंसल्टेंसी के फील्ड में हूँ, मंडे टू फ्राइडे ऑफिस ड्यूटी. रविवार को साफ़ सफाई, मिलना मिलाना या पोस्टें पढना, (कविता, ग़ज़ल, हास्य, कुछ भी) लिखना. एक दिन सेटरडे को बिजनेस (स्वयं को बिजी रखने) की प्लानिंग करता हूँ. और हाँ एक गुड न्यूज है. मैंने अपना बिजनेस का रजिस्ट्रेशन करा लिया है. अब तो बिजनेस को हलके में नहीं लूँगा." जैसे पिछले दो साल से करता आया था. फिर किसी ने टोका "बाय द वे आप करना क्या चाहते हैं?" मैंने बोला "छोटा मुंह बड़ी बात. मैं अपने जीवन में एक लाख युवाओं को बिजनेस ट्रेनिंग देना चाहता हूँ जिसमे ज्यादातर भारतीय युवा हों जहां वे स्वयं के बनाए हुए विदेश के क्लाइंट्स को इन्टरनेट पे डील करें और आत्मविश्वास से ये बोलें कंपनी अगर जॉब से निकाल भी दे तो कोई फिकर नहीं अपना साईड बिजनेस से खर्चा निकलता रहेगा  "  (शेष अगले भाग में जारी...)

ये पोस्ट विशेष कर मैंने 20 से 30 के युवाओं के लिए लिखा है. बाकी सभी नए पुराने ब्लोगर साथियों के लिए जिनके मेल आते रहते हैं बड़े स्नेह से पूछते हैं सुलभ कुछ नया नहीं लिख रहे हो. अभी कल ही नोएडा के फ्लावर एग्जिबिशन में गया हमारे पी.जी. के पास वाले स्टेडियम में ही लगा है, बहुत तरह के फूलों और केक्टस के पौधे देखे. बोनसाई ने विशेष आकर्षित किया (देखें चित्र ).







चलिए कुछ पंक्तियाँ पेश है....

रौनके महफ़िल में मुश्किलात पेश करते हैं
 
उलझे उलझे से हम
ख्यालात पेश करते है
कोई रो रो कर अपने जज़्बात पेश परते हैं
हम हँसते हुए मुकम्मल हालात पेश करते हैं

- सुलभ

Tuesday, November 10, 2009

यह चिट्ठी तो अनमोल है



मेरे विद्यार्थी जीवन में और आज नौकरी में भी पत्र और पत्रलेखन की महत्ता क्या मायने रखती है यह सिर्फ मैं ही समझ सकता हूँ. मेरे व्यक्तित्व विकास और लेखकीय सुधार में डाकखाने (विशेषरूप से डाकघर अररिया) का बड़ा योगदान है. अभी कुछ दिनों पहले (27-अक्तूबर-2009 को) मैंने अपने शहर अररिया से एक पोस्टकार्ड प्रेषित किया तो पिछले कुछ वर्षों के डाक घरो के अनंत चक्कर सहसा ही जेहन में आ गए. मैं बहुत खुश हूँ की अपने मित्रो, पत्रमित्रो, विभिन्न सम्पादकों और अन्य प्रियजनों के सैकडो ख़त मेरे पास सुरक्षित हैं. इनको पढना एक अद्भूत अहसास है.

मुझे ठीक ठीक यह तो याद नहीं है मैंने अपना पहला ख़त कब लिखा था पर इतना जरूर याद है की मैंने अपने प्रिय मामा जी श्री देवव्रत चौधरी, दार्जिलिंग (पं.बंगाल) को लिखा था. उनदिनों स्कूलों में पत्र लेखन की सैद्यान्तिक शिक्षा नियमित दी जाती थी परन्तु व्यावहारिक ट्रेनिंग घर के ही किसी बड़े बुजर्गों के माध्यम से हो पाता था. जब मैंने एक सादे कागज़ पर पत्र लिख कर अपनी माँ को दिखाया तो वो खुश होकर मुस्कराई जरूर लेकिन मुझे प्रथम पंक्ति में ही गलती कह कर सुधार करने को कह दिया. माँ ने कहा बेटा "प्रिय मामा जी" के जगह पर "आदरणीय मामा जी" लिखो, यह चिट्ठी तुम अपने किसी साथी को नहीं लिख रहे हो. जिस प्रकार मैं आदरणीय पिताजी, चरण स्पर्श लिखती हूँ तुम भी वैसे ही लिखो वे बड़े हैं . अपनी मम्मी के इस प्रकार सार्थक आलोचना किये जाने पर मैं उनदिनों दुखी हो गया था. मेरा बाल मन इसलिए चिडचिडा गया था कि मुझे फिर से अक्षर बनाकर पूरा ख़त लिखना पड़ेगा और गुलाबी लैटर पैड का एक और पन्ना जियान(नुकसान) होगा. पर आज गर्वित होता हूँ की माँ ही मेरी पहली गुरु है.


थोड़े और बड़े हुए तो अपने विद्यार्थी जीवन में घटित एक प्रसंग को मैंने पत्रिका सुमन सौरभ 'कोशोरो की सचेतक पत्रिका' जो की इसका स्लोगन है यह मासिक पत्रिका मेरी सर्वप्रिय पत्रिका होती थी. इसके एक स्तम्भ "मेरे जीवन की रोचक घटना " के अर्न्तगत पत्र लिखकर सम्पादक महोदय को भेजा था। दो तीन माह बाद अपना नाम पत्रिका में देखकर मैं अगले कई दिनों तक मुस्कराता रह गया

कक्षा दसवीं और ग्यारहवीं तक पत्र लेखन का शौक पूरी तरह परवान चढ़ चुका था. पत्रमैत्री के माध्यम से भारत के चार राज्यों में अनेक चिट्ठीओं का आदान प्रदान हो चुका था. कुल छ: दोस्तों में मुझे रामनगर, पश्चिम चंपारण(बिहार) के निखिल गौतम का पत्र विशेष प्रिय था. वे मुझसे एक साल जूनियर थे परन्तु पत्र लेखन की विधा में वे मुझसे आगे थे ऐसा मैं मानता हूँ. निखिल का पत्र पढना मेरे लिए अलौकिक ख़ुशी का अनुभव करना जैसे होता था. उसकी नज़र में मेरी चिट्ठी दिल को छूने वाली और मेरी छवि एक स्नेहमयी दोस्त की है ऐसा उसके जवाबी चिट्ठे से प्रतीत होता था. लेकिन सच्चाई यही है की मेरी पंक्तियों में हिंदी की अनेक गलतियां होती थी और मैं निखिल को सर्वश्रेष्ठ इसलिए भी मानता था की उसका लिखा एक एक शब्द और पैरा त्रुटी रहित होता था. उसकी लेखनी प्रवाहमय व हिंदी के स्पष्ट शब्दों से सजी होती थी बहुत ढूँढने पर एक-आध गलतियां किसी को मिल भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है. कहना पड़ेगा की मेरी लेखकीय सुधार में निखिल का भी योगदान है.

चिट्ठीयां जीवनदायिनी दवा की तरह असरदार होती है. दिल से लिखी चिट्ठी मृतप्राय जीवों में भी नयी जान फूंक देती है. एक पुरानी रोचक घटना है - मेरी फुफेरी बहन की चचेरी दीदी (वे सब परिवार में साथ रहते थे ) शादी के 5 महीने बाद जब ससुराल से अपने मायके आई तो फिर कोई विदाई नहीं हुई. रिश्तेदारी में किसी बेईज्ज़ती के मुद्दे पर माता-पिता सास-ससुर में ठनी हुई थी. 6 महीने बीतने पर भी दोनों पक्षों में कोई सहमती नहीं बनी इधर लड़की के पिताजी अड़े हुए थे "मैं थोड़े न अपनी बेटी को ससुराल पहुंचाऊंगा, वे आयें और विदाई ले जाए". कोई हल न होता देख दीदी (दुःख और वेदना से भरी एक पत्नी) ने एक ख़त अपने पति परमेश्वर के नाम लिखा. सप्ताह दस दिन बाद ही अचानक से जीजाजी अपनी पत्नी को लेने अपने ससुराल आ पहुंचे. घर के सभी बड़े लोगों को आश्चर्य में डालते हुए वो विदाई ले गए. कुछ दिनों बाद ही जीजा ने चिट्ठी को सारा श्रेय देते हुए यह बात अपनी साली के समक्ष रखा था. सम्बन्ध मधुर हो जाने के बाद मुझे यह सब अपनी फुफेरी बहन से पता चला.

आज इन्टरनेट/मोबाइल के जमाने में पत्र लिखना कितना जटिल कार्य लगता है. मैं फिर भी कोशिश करता हूँ की महीने में दो-एक चिट्ठी छोटे भाई बहनों/ या रिश्तेदारों को लिखा जाये. इससे कोई इनकार नहीं कर सकता की संबंधो की उष्मा बनाए रखने में एक चिट्ठी सशक्त भूमिका निभाती है. कभी आप पुराने खतों को अकेले में पढ़कर देखना ये यादों के समंदर में गहरे डुबो देगी जब आप बाहर आयेंगे तो देखेंगे की आपके हाथों में कुछ ऐसे मोतियाँ हैं जिनकी कीमत सिवाय आपके कोई नहीं समझ सकता. आप बरबस कह उठेंगे यह चिट्ठी तो अनमोल है.



आख़िर में एक शे...

मेरे ज़नाजे पर कफ़न नहीं चिट्ठियों की चद्दर हो
मेरी ख्वाहिश है मेरे कब्र के नजदीक डाकघर हो
- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'

Sunday, August 30, 2009

अपने जन्मदिन पर दादाजी को समर्पित कविता

अपने जन्मदिन (31-अगस्त) की पूर्व संध्या पर यह कविता मेरे दादाजी परमआदरणीय श्री शिवनाथ जायसवाल (अररिया, बिहार) जी को समर्पित है। वे आज 82 की वय में भी दुबले शरीर के साथ कर्मठ सत विचारों से ओतप्रोत है। मेरी इश्वर से प्रार्थना है - उनका आर्शीवाद चौथी पीढी को भी प्राप्त हो।।

मीलों पैदल चलें जीवन भर किए सहस्त्रों काम
मेहनत की एक एक पाई से सफल किए सब काम

साफ़ नीति और सीधी बात कहके लेते वाजिब दाम
माप
तौल में इतने निपुण कभी घटे एक ग्राम

आज दो दशक से ऊपर भये दादीजी का स्वर्गवास
उनकी भूमिका भी स्वयं निभाये ना दिखे कभी उदास

कहते अक्सर मुझसे वे करो लगन से अपना काम
तुझे अर्थ की क्या जरुरत " सुलभ " है तेरा नाम

धरती रुकी सूरज रुकेगा सब करते अपना काम
उठे तुरत जो गिरे कभी, कहते चलना अपना काम

- सुलभ (गुडगाँव, हरयाणा)

Friday, August 7, 2009

मानेसर में एक शाम (IMT Manesar NH-8, Gurgaon )

ऑटो, बसों, टेम्पुओं में खामोश इंसान है
भारी वाहनों में लदे ओद्योगिक सामान हैं

सुबह शाम कारों की लम्बी लाइने
चौबीसों घंटे गुंजायमान हाईवे .

प्रकृति के नियमो से अनजान इतर
आजीविका के लिए बसाए शहर

शारीर बना मशीन उद्योगों से जुड़कर
खाया पिया ऐसे बस हो जाये बसर

जीवन और उद्योगीकरण का कैसा मेल है
बिजली पानी संकट एक सालाना खेल है

मालिक नाखुश और लाचार हैं मजदूर
व्यवस्था के आगे दोनों हैं मजबूर

यत्र तत्र छाया उदासीनता का जोग
कितना वीरान है मानेसर का उद्योग ..

लिंक विदइन

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जिंदगी हसीं है -
"खाने के लिए ज्ञान पचाने के लिए विज्ञान, सोने के लिए फर्श पहनने के लिए आदर्श, जीने के लिए सपने चलने के लिए इरादे, हंसने के लिए दर्द लिखने के लिए यादें... न कोई शिकायत न कोई कमी है, एक शायर की जिंदगी यूँ ही हसीं है... "