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अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारमनसानां तु वसुधैव कुटुंबकम्

Tuesday, November 10, 2009

यह चिट्ठी तो अनमोल है



मेरे विद्यार्थी जीवन में और आज नौकरी में भी पत्र और पत्रलेखन की महत्ता क्या मायने रखती है यह सिर्फ मैं ही समझ सकता हूँ. मेरे व्यक्तित्व विकास और लेखकीय सुधार में डाकखाने (विशेषरूप से डाकघर अररिया) का बड़ा योगदान है. अभी कुछ दिनों पहले (27-अक्तूबर-2009 को) मैंने अपने शहर अररिया से एक पोस्टकार्ड प्रेषित किया तो पिछले कुछ वर्षों के डाक घरो के अनंत चक्कर सहसा ही जेहन में आ गए. मैं बहुत खुश हूँ की अपने मित्रो, पत्रमित्रो, विभिन्न सम्पादकों और अन्य प्रियजनों के सैकडो ख़त मेरे पास सुरक्षित हैं. इनको पढना एक अद्भूत अहसास है.

मुझे ठीक ठीक यह तो याद नहीं है मैंने अपना पहला ख़त कब लिखा था पर इतना जरूर याद है की मैंने अपने प्रिय मामा जी श्री देवव्रत चौधरी, दार्जिलिंग (पं.बंगाल) को लिखा था. उनदिनों स्कूलों में पत्र लेखन की सैद्यान्तिक शिक्षा नियमित दी जाती थी परन्तु व्यावहारिक ट्रेनिंग घर के ही किसी बड़े बुजर्गों के माध्यम से हो पाता था. जब मैंने एक सादे कागज़ पर पत्र लिख कर अपनी माँ को दिखाया तो वो खुश होकर मुस्कराई जरूर लेकिन मुझे प्रथम पंक्ति में ही गलती कह कर सुधार करने को कह दिया. माँ ने कहा बेटा "प्रिय मामा जी" के जगह पर "आदरणीय मामा जी" लिखो, यह चिट्ठी तुम अपने किसी साथी को नहीं लिख रहे हो. जिस प्रकार मैं आदरणीय पिताजी, चरण स्पर्श लिखती हूँ तुम भी वैसे ही लिखो वे बड़े हैं . अपनी मम्मी के इस प्रकार सार्थक आलोचना किये जाने पर मैं उनदिनों दुखी हो गया था. मेरा बाल मन इसलिए चिडचिडा गया था कि मुझे फिर से अक्षर बनाकर पूरा ख़त लिखना पड़ेगा और गुलाबी लैटर पैड का एक और पन्ना जियान(नुकसान) होगा. पर आज गर्वित होता हूँ की माँ ही मेरी पहली गुरु है.


थोड़े और बड़े हुए तो अपने विद्यार्थी जीवन में घटित एक प्रसंग को मैंने पत्रिका सुमन सौरभ 'कोशोरो की सचेतक पत्रिका' जो की इसका स्लोगन है यह मासिक पत्रिका मेरी सर्वप्रिय पत्रिका होती थी. इसके एक स्तम्भ "मेरे जीवन की रोचक घटना " के अर्न्तगत पत्र लिखकर सम्पादक महोदय को भेजा था। दो तीन माह बाद अपना नाम पत्रिका में देखकर मैं अगले कई दिनों तक मुस्कराता रह गया

कक्षा दसवीं और ग्यारहवीं तक पत्र लेखन का शौक पूरी तरह परवान चढ़ चुका था. पत्रमैत्री के माध्यम से भारत के चार राज्यों में अनेक चिट्ठीओं का आदान प्रदान हो चुका था. कुल छ: दोस्तों में मुझे रामनगर, पश्चिम चंपारण(बिहार) के निखिल गौतम का पत्र विशेष प्रिय था. वे मुझसे एक साल जूनियर थे परन्तु पत्र लेखन की विधा में वे मुझसे आगे थे ऐसा मैं मानता हूँ. निखिल का पत्र पढना मेरे लिए अलौकिक ख़ुशी का अनुभव करना जैसे होता था. उसकी नज़र में मेरी चिट्ठी दिल को छूने वाली और मेरी छवि एक स्नेहमयी दोस्त की है ऐसा उसके जवाबी चिट्ठे से प्रतीत होता था. लेकिन सच्चाई यही है की मेरी पंक्तियों में हिंदी की अनेक गलतियां होती थी और मैं निखिल को सर्वश्रेष्ठ इसलिए भी मानता था की उसका लिखा एक एक शब्द और पैरा त्रुटी रहित होता था. उसकी लेखनी प्रवाहमय व हिंदी के स्पष्ट शब्दों से सजी होती थी बहुत ढूँढने पर एक-आध गलतियां किसी को मिल भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है. कहना पड़ेगा की मेरी लेखकीय सुधार में निखिल का भी योगदान है.

चिट्ठीयां जीवनदायिनी दवा की तरह असरदार होती है. दिल से लिखी चिट्ठी मृतप्राय जीवों में भी नयी जान फूंक देती है. एक पुरानी रोचक घटना है - मेरी फुफेरी बहन की चचेरी दीदी (वे सब परिवार में साथ रहते थे ) शादी के 5 महीने बाद जब ससुराल से अपने मायके आई तो फिर कोई विदाई नहीं हुई. रिश्तेदारी में किसी बेईज्ज़ती के मुद्दे पर माता-पिता सास-ससुर में ठनी हुई थी. 6 महीने बीतने पर भी दोनों पक्षों में कोई सहमती नहीं बनी इधर लड़की के पिताजी अड़े हुए थे "मैं थोड़े न अपनी बेटी को ससुराल पहुंचाऊंगा, वे आयें और विदाई ले जाए". कोई हल न होता देख दीदी (दुःख और वेदना से भरी एक पत्नी) ने एक ख़त अपने पति परमेश्वर के नाम लिखा. सप्ताह दस दिन बाद ही अचानक से जीजाजी अपनी पत्नी को लेने अपने ससुराल आ पहुंचे. घर के सभी बड़े लोगों को आश्चर्य में डालते हुए वो विदाई ले गए. कुछ दिनों बाद ही जीजा ने चिट्ठी को सारा श्रेय देते हुए यह बात अपनी साली के समक्ष रखा था. सम्बन्ध मधुर हो जाने के बाद मुझे यह सब अपनी फुफेरी बहन से पता चला.

आज इन्टरनेट/मोबाइल के जमाने में पत्र लिखना कितना जटिल कार्य लगता है. मैं फिर भी कोशिश करता हूँ की महीने में दो-एक चिट्ठी छोटे भाई बहनों/ या रिश्तेदारों को लिखा जाये. इससे कोई इनकार नहीं कर सकता की संबंधो की उष्मा बनाए रखने में एक चिट्ठी सशक्त भूमिका निभाती है. कभी आप पुराने खतों को अकेले में पढ़कर देखना ये यादों के समंदर में गहरे डुबो देगी जब आप बाहर आयेंगे तो देखेंगे की आपके हाथों में कुछ ऐसे मोतियाँ हैं जिनकी कीमत सिवाय आपके कोई नहीं समझ सकता. आप बरबस कह उठेंगे यह चिट्ठी तो अनमोल है.



आख़िर में एक शे...

मेरे ज़नाजे पर कफ़न नहीं चिट्ठियों की चद्दर हो
मेरी ख्वाहिश है मेरे कब्र के नजदीक डाकघर हो
- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'

17 comments:

Nirmla Kapila said...

बिलकुल सही कहा है चिट्ठीय़ँ सच मे यादों का अनमोल खजाना होती हैं। शुभकामनायें

महफूज़ अली said...

bahut achcha laga yeh lekh......

अभिषेक ओझा said...

ओह ! नोस्टालजिक कर दिया आपने. बिलकुल अपनी बात. कभी मैंने भी यही बात कही थी (http://ojha-uwaach.blogspot.com/2007/05/blog-post.html). पर आपने ज्यादा अच्छे से कही है, बात तो वही है. बिलकुल अपनी.

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लिखा जी, चिट्ठी की अलग ही बात होती है, मेरे पास भी कुछ चिट्ठीयां पडी है , समय मिला त्पो पढ कर देखेगे. वेसे मुझे पत्र लिखे सदिया हो गई.
धन्यवाद

गिरिजेश राव said...

चिट्ठियाँ । लम्बी लम्बी चिट्ठियाँ। कुछ फोन लील गए , कुछ मोबाइल और कुछ जिन्दगी की बेकार भागदौड़ चबा गई बेवकूफ गाय की तरह !

भाई, ये ललरौटी वाला बैकग्राउण्ड हटा दो, हमरी अँखियाँ पिराय जात हैं।

सुलभ सतरंगी said...

@गिरिजेश राव said... भाई, ये ललरौटी वाला बैकग्राउण्ड हटा दो, हमरी अँखियाँ पिराय जात हैं।
-
गिरिजेश जी, हटा दिया. अब ठीक लगता है. शुक्रिया आपका.

sujit kumar lucky said...

मेरे ज़नाजे पर कफ़न नहीं चिट्ठियों की चद्दर हो
मेरी ख्वाहिश है मेरे कब्र के नजदीक डाकघर हो

above one is the final touch for your post ! ! ! nice one

Parimal kumar jha said...

Sulabh, Kuchh yadon ke pal Dil ko chhu gaye, Maine aaj hi kuch purani chithiya parhi, Thanks a lot.

RAJ SINH said...

priy saतरंगी ',
आपकी टिप्पणी उत्साह बढाती है .आशा करता हूँ की आप जैसे स्नेहियों के विश्वास पर खरा उतरून .
और आपके लेखन में सचमुच बड़े रंग मिले .आप की परिभाषाएं ही आपकी जिन्दगी के सुन्दर दर्शन को कह जाती हैं .
आज कागजी चिट्ठियों का दौर न रहा उतना .हमारे आप जैसे लोगों के बीच चिट्ठियां भी इलेक्ट्रानिक हो गयी हैं .
लेकिन क्या उन्हें , जैसे बड़ी सारी चिट्ठियों को रखा जाता था , तकिये के नीचे रखा जा सकता है ?
हो सकता है की हाँ ,प्रिंट कर . पर वह सुगंध ? जो हाथों के मिलाती थी ?
अच्छा लगा आपको पढ़.
आता रहूँगा . अनुभव भी बांटता रहूँगा .

transliteration kee galtiyon ke liye mafee .

Ranjit Kumar said...

Kahan gum ho gayi thi ye ahsas
chitthian hi deti thi apno ki yaad
kya kare ab sms ka jamana hai
pen se likhne me jo dard aur ahsas hoti thi bo ab kahan.

Dhanyabad

Babli said...

बहुत ही सुंदर और सही लिखा है आपने ! चिट्ठियों का महत्व ही अलग होता है और बहूत ही अनमोल होता है जिसे हम हमेशा संभालकर रखते हैं! आजकल तो चिट्ठियों का ज़माना नहीं रहा जब से मेल करने लग गए लोग! इस बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई!

S B Tamare said...

प्रिय सुलभ जी

बड़ा सुन्दर ब्लॉग बन पडा है आपका, बधाई !

जिसे पढ़कर चित ठहरता हो उसे चिठ्ठी कहते है, इस तथ्य की पुष्टि करता आपका यह आलेख बड़ा सुन्दर बन पडा है /

फोन और इंटरनेट के धमाल के बावजूद मै मानता हूँ की चिठ्ठी का महत्त्व कम नहीं हुआ यधपि व्यवहार जरूर कम हो गया है, लिखने पढने की कुशलता या व्याकरण शुद्धि वास्तव में चिठ्ठी बढ़िया जरिया थी जो दुसरे किसी और साधन से पूरी नहीं हो सकती , मुझे याद है जब हम भी चिठ्ठी लिखा करते थे तो एक भी अशुद्धि हो जाने पर सारा पन्ना ही फाड़ देते थे / खैर , अच्छी याद दिलाई आपने बचपन की / थैंक्स//


shashibhushantamare

Anonymous said...
This comment has been removed by a blog administrator.
गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

adabhut

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया लेखन .. लोगों में अब तो चिट्ठी लिखने की आदत ही समाप्‍त होती जा रही है !!

रश्मि प्रभा... said...

मेरे ज़नाजे पर कफ़न नहीं चिट्ठियों की चद्दर हो
मेरी ख्वाहिश है मेरे कब्र के नजदीक डाकघर हो
......waah, yahi khwaahish hai meri bhi

chintu said...

Bahut khub likhe ho lekin kuch ascherya nahi kyonki hume pata tha tum kuch alag ho .Ek bar phir tumhe pakar apar khusi mahsus kar raha hoon.
Kuhdahaffis Satrangi Ji

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