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अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारमनसानां तु वसुधैव कुटुंबकम्

Wednesday, December 31, 2014

चार दिन की जवानी लिखेंगे

मित्रों, पेश है एक ग़ज़ल के कुछ शेर - 

चार दिन की जवानी लिखेंगे 
उस में सौ सौ कहानी लिखेंगे 

तुम उसे जिंदगानी समझना  
हम जहाँ आग-पानी लिखेंगे 

ख़ुदकुशी बाद में हम करेंगे 
पहले खेती किसानी लिखेंगे 

तपते सेहरा में जब आ चुके हैं 
रेत पर नौजवानी लिखेंगे 

चाँद की रोशनाई मिली है 
रात को रातरानी लिखेंगे 

घुल रही है मोहब्ब्त फ़ज़ा में 
हमसफ़र जाफरानी लिखेंगे 
 
बेच सकते नहीं हम अना को  
आदतें खानदानी लिखेंगे 

Tuesday, December 31, 2013

उल्लेखनीय संकल्प - 31-DEC-2013


 

आज से तीन साल पहले दिसंबर माह के अंतिम सप्ताह में एक पोस्ट किया था "उल्लेखनीय संकल्प" उनदिनों जीवन एक नया मोड़ पाने के तरस रहा था, फिर बीते दिनों के कुछ प्रयासों में मुझे मिला भी. 
कई बार ऐसा होता है कि स्वयं  को भावनात्मक संतुष्टि देने प्रयास में हम जरुरत से ज्यादा समय व्यतीत कर देते हैं वहाँ पर जहाँ कर्तव्य न्यूनतम हो जाता है. अतः बीच बीच में परिक्षण (चेकिंग) करते रहना चाहिए कि हमारे दैनिक साप्ताहिक, मासिक कार्य और घरेलू जिम्मेदारियां के बीच कोई खाई तो नहीं पनप रहा.   

स्वयं के ब्लॉग संचालन से (या अनौपचारिक डायरी लेखन से)  एक फायदा यह भी है कि हम पीछे मुड़कर ये देख पाते हैं कि हमने आने वाले समय के लिए क्या क्या कार्य तय किया था और आज उन सब की क्या स्थिति है. ये सुधार और अभ्यास का विषय होना चाहिए तभी हम अपने छोटे छोटे लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं और इन्ही प्राप्तियों के समुच्चय से बड़े लक्ष्य तक पहुँचने का सफ़र आसान हो जाता है.


बहरहाल आप सभी ब्लॉगर साथियों/पाठकों  को नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !!  

नई आस हो  नई ताजगी, नई हो पहल नया ढंग हो 
नए साल में नए गुल खिले, नई ख़ुशबुएँ नया रंग हो  

कोई  जिंदगी न सुरंग हो, न ये कारवाँ ही अपंग हो 
ब-र-से वहां धूप प्रेम की, जो ठिठुरता कहीं अंग हो 


Friday, December 21, 2012

न जाने नया साल क्या गुल खिलाये


ये दिल जब भी टूटे न आवाज़ आये 
यूँ ही दिल ये रस्मे मोहब्बत निभाये 

वो भी साथ बैठे हँसे और हंसाये 
कोई जाके रूठे हुए को  मनाये 

मेरी दास्ताने वफा बस यही है 
युगों से खड़ा हूँ मैं पलकें बिछाये 

न पूछो कभी ज़ात उसकी जो तुमको 
कहीं तपते सहरा में पानी पिलाये 

खलल नींद में बहरों की कब है पड़ता 
कोई चीख के शोर कितना मचाये 

मेरे सपनो की राह में मुश्किलें हैं 
न जाने नया साल क्या गुल खिलाये 
- सुलभ
(नोट: सुबीर संवाद सेवा के मंच से तरही ग़ज़ल )

Friday, September 14, 2012

मुस्कराता हाथ मलता सोचता रहता हूँ मैं




मुस्कराता हाथ मलता सोचता रहता हूँ मैं 
साथ चलती जिंदगी से क्यूँ खफा रहता हूँ मैं 

आएगा इकदिन ज़माना संजीदा रहता हूँ मैं   
धूप बारिश सब भुलाकर बस डटा रहता हूँ मैं  

आँधियों में भी गिरा हूँ, धूप में भी मैं जला 
ख़्वाब जो हरदम सुहाना देखता रहता हूँ मैं 

हाले दिल कैसा होगा जब होगा उनसे सामना
राह चलते दिल ही दिल में पूछता रहता हूँ मैं

आबरू जम्हूरियत की रहनुमा सब ले उड़े 
बेसहारा मुल्क लेकर चीखता रहता हूँ मैं  

मैं जो हुआ घायल तो आएं लोग मुझको देखने 
टूटने के बाद भी क्या आईना रहता हूँ मैं 
 - सुलभ

लिंक विदइन

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जिंदगी हसीं है -
"खाने के लिए ज्ञान पचाने के लिए विज्ञान, सोने के लिए फर्श पहनने के लिए आदर्श, जीने के लिए सपने चलने के लिए इरादे, हंसने के लिए दर्द लिखने के लिए यादें... न कोई शिकायत न कोई कमी है, एक शायर की जिंदगी यूँ ही हसीं है... "