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अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारमनसानां तु वसुधैव कुटुंबकम्

Friday, February 5, 2010

उठो सुबह हो चुकी चमक रहा आफताब देखो


इससे पहले कि गीली आँखों में तेज़ाब देखो 
होश में आओ रहनुमाओं वर्ना इंकलाब देखो


हक़ मार जाते हो
तुम अपने ही खिदमतगार के
रगों में इसके खून नहीं  सुलगता अलाव देखो


जंगल पहाड़ उजाड़ कर ये कैसी तरक्की
पाई है
चार दिन कि जिंदगी में कुदरत के सौ अज़ाब देखो


जमीन मकान आसमान सब यहाँ बेमानी है
हवा पानी को तरस रहे शहर बेहिसाब देखो


महफ़िल कैसे सजे यहाँ तेल खरीदने की कूबत नहीं
महंगाई के आगे हार गए कितने रईस नवाब देखो


सच को झूट बनाने का खेल और नहीं खेल सकते 
प्यार भरे तिरे सवाल के आगे हम हुए लाजवाब देखो 


खोल दो बंद दरवाजे खिड़कियाँ औ' रोशनदानों को
उठो सुबह हो चुकी चमक रहा आफताब देखो ||
***



17 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

इससे पहले कि गीली आँखों में तेज़ाब देखो
होश में आओ रहनुमाओं वर्ना इंकलाब देखो

लाजबाब !

दिगम्बर नासवा said...

जंगल पहाड़ उजाड़ कर ये कैसी तरक्की पाई है
चार दिन कि जिंदगी में कुदरत के सौ अज़ाब देखो ..

समाज के दर्द को उबारा है सुलभ जी आपने अपने शेरों में ........... पर्यावरण जैसे दर्द अपने सामने ही जीने पढ़ेंगे हमें .........

Suman said...

होश में आओ रहनुमाओं वर्ना इंकलाब देखो
nice

अनिल कान्त : said...

वाह क्या लिखे हो भाई

अजय कुमार said...

खोल दो बंद दरवाजे खिड़कियाँ औ' रोशनदानों को
उठो सुबह हो चुकी चमक रहा आफताब देखो ||

सच्ची बात , सार्थक संदेश , बधाई सुलभजी

निर्मला कपिला said...

इससे पहले कि गीली आँखों में तेज़ाब देखो
होश में आओ रहनुमाओं वर्ना इंकलाब देखो

महफ़िल कैसे सजे यहाँ तेल खरीदने की कूबत नहीं
महंगाई के आगे हार गए कितने रईस नवाब देखो
वाह क्या कहूँ खडी हो कर तालियाँ बजा रही हूँ --- लाजवाब शुभकामनायें

Udan Tashtari said...

शानदार रचा है, वाह!!

रश्मि प्रभा... said...

bahut hi behtareen aaftaab

श्याम कोरी 'उदय' said...

... बहुत सुन्दर, प्रसंशनीय!!!!

अल्पना वर्मा said...

हक़ मार जाते हो तुम अपने ही खिदमतगार के
रगों में इसके खून नहीं सुलगता अलाव देखो

kya baat hai!
inqlaabi sa sunaayee deta hai!

yahi jazaba bana rahe.

Sabhi sher ek se badh kar ek!

bahut badhiya ghazal!

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों का समावेश इस रचना में, बधाई के साथ शुभकामनायें ।

Babli said...

जंगल पहाड़ उजाड़ कर ये कैसी तरक्की पाई है
चार दिन कि जिंदगी में कुदरत के सौ अज़ाब देखो
जमीन मकान आसमान सब यहाँ बेमानी है
हवा पानी को तरस रहे शहर बेहिसाब देखो..
वाह वाह क्या बात है! बहुत ख़ूबसूरत पंक्तियाँ! इस लाजवाब रचना के लिए बधाई!

सर्वत एम० said...

सुलभ, आपके खयालात, जज्बात की जितनी भी तारीफ की जाए, कम है. यही आक्रोश, यही सोच, यही चिन्तन नवजवानों में होने चाहिएं. आपने युवा भारतीय होने का सबूत दे दिया है.
मेरी इतनी प्रशंसा मत करें कि फूल कर फट जाऊं.

नीरज गोस्वामी said...

हक़ मार जाते हो तुम अपने ही खिदमतगार के
रगों में इसके खून नहीं सुलगता अलाव देखो

सुलभ जी आपकी इस क्रांतिकारी विचारधारा वाली रचना को सलाम...बहुत खूब लिखा है आपने...
नीरज

Devendra said...

खोल दो बंद दरवाजे खिड़कियाँ औ' रोशनदानों को
उठो सुबह हो चुकी चमक रहा आफताब देखो ||
..अच्छा शेर. अच्छे भाव वाली गज़ल.

Babli said...

महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!

akarshjoshi said...

bahut umda likha hai sulabh

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जिंदगी हसीं है -
"खाने के लिए ज्ञान पचाने के लिए विज्ञान, सोने के लिए फर्श पहनने के लिए आदर्श, जीने के लिए सपने चलने के लिए इरादे, हंसने के लिए दर्द लिखने के लिए यादें... न कोई शिकायत न कोई कमी है, एक शायर की जिंदगी यूँ ही हसीं है... "