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अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारमनसानां तु वसुधैव कुटुंबकम्

Wednesday, July 29, 2009

लंका दहन (Hasya Vyangya)


रामलीला में लंका दहन का काण्ड चल रहा था।
मंच पर हनुमान जोर जोर से उछल रहा था।
अचानक हो गई गलती भारी। चौपट हो गई पूरी तयारी।
हनुमान सचमुच ही आग लगा दी। पुरे पंडाल में हरकंप मचा दी।
एक सेवक आया भागते हुए। संयोजक से बोला घबराते हुए।
महोदय अनर्थ हो गया, जल्दी कुछ करवाएं।
पंडाल में आग लग गई, चल कर बुझायें।
संयोजक जो था मंत्री का चेला, गुर्राते हुए बोला।
अरे मुरख हम तुझे समझाते हैं, ऐसे मौके बार बार नही आते हैं।
जल जाने दो समूची लंका, आग लगाओ मिलकर सारे।
अपना क्या जाता है, बिमा करवा रखी है प्यारे।

1 comment:

Babli said...

मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने! अब तो मैं आपका फोल्लोवेर बन गई हूँ इसलिए आती रहूंगी!
मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com
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लिंक विदइन

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जिंदगी हसीं है -
"खाने के लिए ज्ञान पचाने के लिए विज्ञान, सोने के लिए फर्श पहनने के लिए आदर्श, जीने के लिए सपने चलने के लिए इरादे, हंसने के लिए दर्द लिखने के लिए यादें... न कोई शिकायत न कोई कमी है, एक शायर की जिंदगी यूँ ही हसीं है... "