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हम आपके सहयात्री हैं.

अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारमनसानां तु वसुधैव कुटुंबकम्

Thursday, March 26, 2020

उसी विधि सब रहें जिस विधि राखे राम, उस कवि को सौ सौ बार प्रणाम !


उस कवि की कल्पना सच हुयी, उस कवि को सौ सौ बार प्रणाम !

उस कवि ने लिक्खा था एक गाँव हो 
एक अपना बगिया, शीतल छाँव हो 
मुँह धोवें हम दातुन तुलसी पानी से 
हाथ मिले पहले पशुपंछी किसानी से 
एक चुप हो सौ सुख हो टहलने में 
केवल एक मेले हों बारह महीने में 
कुछ दिनों का उपवास एकांत विहार हो 
एक सांझ भोजन माड़भात फलाहार हो 
बच्चे हमारे बंधु बांधव परदेस में विद्वान् हों 
संकट कोई आए कभी उनके संग हनुमान हों 

उसी विधि सब रहें जिस विधि राखे राम 
उस कवि की कल्पना सच हुयी, 
उस कवि को सौ सौ बार प्रणाम !

- सुलभ जायसवाल, बसंतपुर (अररिया कोर्ट ) से 




[इस पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया ]

Wednesday, December 31, 2014

चार दिन की जवानी लिखेंगे

मित्रों, पेश है एक ग़ज़ल के कुछ शेर - 

चार दिन की जवानी लिखेंगे 
उस में सौ सौ कहानी लिखेंगे 

तुम उसे जिंदगानी समझना  
हम जहाँ आग-पानी लिखेंगे 

ख़ुदकुशी बाद में हम करेंगे 
पहले खेती किसानी लिखेंगे 

तपते सेहरा में जब आ चुके हैं 
रेत पर नौजवानी लिखेंगे 

चाँद की रोशनाई मिली है 
रात को रातरानी लिखेंगे 

घुल रही है मोहब्ब्त फ़ज़ा में 
हमसफ़र जाफरानी लिखेंगे 
 
बेच सकते नहीं हम अना को  
आदतें खानदानी लिखेंगे 

Tuesday, December 31, 2013

उल्लेखनीय संकल्प - 31-DEC-2013


 

आज से तीन साल पहले दिसंबर माह के अंतिम सप्ताह में एक पोस्ट किया था "उल्लेखनीय संकल्प" उनदिनों जीवन एक नया मोड़ पाने के तरस रहा था, फिर बीते दिनों के कुछ प्रयासों में मुझे मिला भी. 
कई बार ऐसा होता है कि स्वयं  को भावनात्मक संतुष्टि देने प्रयास में हम जरुरत से ज्यादा समय व्यतीत कर देते हैं वहाँ पर जहाँ कर्तव्य न्यूनतम हो जाता है. अतः बीच बीच में परिक्षण (चेकिंग) करते रहना चाहिए कि हमारे दैनिक साप्ताहिक, मासिक कार्य और घरेलू जिम्मेदारियां के बीच कोई खाई तो नहीं पनप रहा.   

स्वयं के ब्लॉग संचालन से (या अनौपचारिक डायरी लेखन से)  एक फायदा यह भी है कि हम पीछे मुड़कर ये देख पाते हैं कि हमने आने वाले समय के लिए क्या क्या कार्य तय किया था और आज उन सब की क्या स्थिति है. ये सुधार और अभ्यास का विषय होना चाहिए तभी हम अपने छोटे छोटे लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं और इन्ही प्राप्तियों के समुच्चय से बड़े लक्ष्य तक पहुँचने का सफ़र आसान हो जाता है.


बहरहाल आप सभी ब्लॉगर साथियों/पाठकों  को नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !!  

नई आस हो  नई ताजगी, नई हो पहल नया ढंग हो 
नए साल में नए गुल खिले, नई ख़ुशबुएँ नया रंग हो  

कोई  जिंदगी न सुरंग हो, न ये कारवाँ ही अपंग हो 
ब-र-से वहां धूप प्रेम की, जो ठिठुरता कहीं अंग हो 


Friday, December 21, 2012

न जाने नया साल क्या गुल खिलाये


ये दिल जब भी टूटे न आवाज़ आये 
यूँ ही दिल ये रस्मे मोहब्बत निभाये 

वो भी साथ बैठे हँसे और हंसाये 
कोई जाके रूठे हुए को  मनाये 

मेरी दास्ताने वफा बस यही है 
युगों से खड़ा हूँ मैं पलकें बिछाये 

न पूछो कभी ज़ात उसकी जो तुमको 
कहीं तपते सहरा में पानी पिलाये 

खलल नींद में बहरों की कब है पड़ता 
कोई चीख के शोर कितना मचाये 

मेरे सपनो की राह में मुश्किलें हैं 
न जाने नया साल क्या गुल खिलाये 
- सुलभ
(नोट: सुबीर संवाद सेवा के मंच से तरही ग़ज़ल )

Friday, September 14, 2012

मुस्कराता हाथ मलता सोचता रहता हूँ मैं




मुस्कराता हाथ मलता सोचता रहता हूँ मैं 
साथ चलती जिंदगी से क्यूँ खफा रहता हूँ मैं 

आएगा इकदिन ज़माना संजीदा रहता हूँ मैं   
धूप बारिश सब भुलाकर बस डटा रहता हूँ मैं  

आँधियों में भी गिरा हूँ, धूप में भी मैं जला 
ख़्वाब जो हरदम सुहाना देखता रहता हूँ मैं 

हाले दिल कैसा होगा जब होगा उनसे सामना
राह चलते दिल ही दिल में पूछता रहता हूँ मैं

आबरू जम्हूरियत की रहनुमा सब ले उड़े 
बेसहारा मुल्क लेकर चीखता रहता हूँ मैं  

मैं जो हुआ घायल तो आएं लोग मुझको देखने 
टूटने के बाद भी क्या आईना रहता हूँ मैं 
 - सुलभ

Friday, May 25, 2012

मौसमी हम क्या खोजें (Ghazal)

 
मौसमी हम क्या खोजें
कुदरती हम क्या खोजें

रात दिन बस जल रहे
जिंदगी हम क्या खोजें

चाँद में ही दाग है
चांदनी हम क्या खोजें

तीरगी ही तीरगी
रोशनी हम क्या खोजें

बेहयायी जिस तरफ
सादगी हम क्या खोजें

मौत खुद ही आएगी
दुश्मनी हम क्या खोजें

राह चलते मिली ग़ज़ल
शायरी हम क्या खोजें

मुफलिसी के दौर में
सनसनी हम क्या खोजें

 
- सुलभ

Wednesday, March 7, 2012

वाह होली वाह !!!

 [चित्र द्वारा: सोनाली सिंह ]



तक धिनैया तक धिनैया फागुन के बयार 
आ गईल हो आ गईल होली के त्यौहार 

तक धिनैया तक धिनैया दौड़अ पकड़अ ट्रेन 
जल्दी से पहुँचअ गाँव बीत न जाए रैन 

तक धिनैया तक धिनैया जियरा नहीं बस में 
नशा चढ़ते जात हई सगरे अंग अंग में 

तक धिनैया तक धिनैया उड़े रंग गुलाल 
लगवा ल रंगवा ल  तू हो आपन गाल 

तक धिनैया तक धिनैया ढोलक संग मृदंग 
झाल तबला हारमोनियम में मचल जंग 

तक धिनैया तक धिनैया गाओ मिलके फाग 
सुर में सुर मिल जाये छेड़ो अईसन राग 

तक धिनैया तक धिनैया एकसे एक पकवान 
पुआ पुरी गुझिया बाड़ा और सुपारी पान 

तक धिनैया तक धिनैया जीजा गए ससुराल 
खूब खातिर भईल उनकर का बताई हाल 

तक धिनैया तक धिनैया भांग के करामात 
सुन ल सब केहु आज बुढऊ के जज़्बात 

तक धिनैया तक धिनैया सजना दूर दराज 
गवना न भईल ई साल सजनी बा उदास 

तक धिनैया तक धिनैया छूट गईल बिहार 
दिल्ली बम्बई के चक्कर में जिनगी बेकार 

होली है !!
- सुलभ 


Monday, February 27, 2012

केवल बारह आने निकले

कल दिल्ली के मोलारबंद गाँव से गुजर  रहा था   बच्चो की टोली ने पानी फेंककर  मुझे होली की हुल्लर बधाई दी. मौसम बदल रहा है तो बहुत कुछ बदल रहा है. कुछ पुराने दर्द में कमी हुई तो कुछ नए दर्द में इजाफा भी हो रहा है. बाकी सब नोर्मल है...

हम जिसे समझाने निकले
वो ही हमे घुमाने निकले

क़र्ज़ किसी ने नहीं लौटाया
तकादा की तो बहाने निकले

टच-मी किस-मी गीत बने
बच्चे बच्चे गाने निकले

जिसने दिया था हक हमको
आज माँगा तो ताने निकले

सुब्ह शाम क्रिकेट में डूबे  
कैसे कैसे दीवाने निकले

एक रुपया कमा कर आया
केवल बारह आने निकले 

बिखरे सारे तिनके चुनकर
सपने फिर से सजाने निकले  


Thursday, December 29, 2011

सिलसिला


बीते कुछ महीनो से
जमा रहा मैं तेरी यादों के संग
कोई असर नहीं रहा
सर्दी की सर्द बातों  का
सुबह घने कोहरे से भी
ज्यादा घना छाया
बीते मुलाकातों का धुंध

अब तो यही लगता है
आने वाले साल का हर पल
तुम्हारे नाम रहेगा
तुम मिलो या न मिलो
सफर यादों का यूँ ही
लम्बा होता जायेगा

और हाँ इंतज़ार तो रहेगा ही
कोई कमी न होगी अहसास में
और न टूटेंगे सपने कभी
साल दर साल
गहरे उतरता जाऊँगा मैं
तुम्हारी यादों में
जारी रहेगा ये  सिलसिला
उम्र भर !

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
आप सभी साथियों को नव वर्ष की शुभकामनाएं
- सुलभ

Sunday, October 23, 2011

ये तो जुल्म हुआ रोशनाई पर

इन दिनो ब्लोगरी के लिये मनोनुकूल वक्त नही मिलता.

आदरणीय श्री दिगम्बर जी ने पुछा कि सुलभ कोई नयी गजल है तो पोस्ट लगाईये उनके विशेष अनुरोध पर कुछ पंक्तियां...


ये तो जुल्म हुआ रोशनाई पर
जो हम लिख रहे हैं मंहगाई पर

हुआ नाम जिनका सचाई पर
वही उतरे अब बेहयायी पर

मोती अश्क के वे छुपा न पाये
बिटिया की रस्मे बिदाई पर

फटेहाल बच्चे क,ख, सिखते
व्यवस्था की फटी चटाई पर

अजी क्या कहें और किसे कहें
रूठे यार की बेअदाई पर 
---

~~ आप सभी साथियों को दीप पर्व की मंगलकामनाएं !!

‍- सुलभ

Wednesday, August 31, 2011

हम जाग रहे हैं


   जिस महान संत के विचारों से मेरे व्यक्तित्व में जो भी न्यूनाधिक या उल्लेखनीय विकास हुआ है  वो हैं स्वामी विवेकानंद.  उनके आह्वान अनिवार्य रूप से आधुनिक मनुष्य के लिए एक मंत्र है. विवेकानंद जी ने जीवन पर्यंत "आत्म जागरण" पर बड़ा जोर रखा, तथ्य यह है कि आप निरंतर जाग रहे हैं और उन्नति की ओर प्रशस्त हैं.  समस्त समाज के उत्थान के लिए चिंतित हैं, प्रयासरत हैं . जागना और जगाना है अपने भीतर के स्व की सुंदरता के लिए.  वसुधैव कुटुम्बकम के लिए.


उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक अपने लक्ष्य तक ना पहुँच जाओ.
Arise, Awake, and Stop Not Till the Goal Is Reached!


 

Thursday, July 21, 2011

भारत वर्ष !



जब आंतरिक मामले हों कमजोर 
और हास्यास्पद हो विदेश नीति
अनुशाशन शुचिता क़ानून प्रबंधन 
शून्य हों राजनैतिक इच्छाशक्ति 

भ्रष्टाचार के नशे में धुत गाड़ीवान 
जब हम बैलों के ऊपर बोझ लादे 
जबरन पिलाए रोज दूषित पानी
और शाम बारूद के उपर खूंटे बांधे 

इसे आजादी का चरमोत्कर्ष कहिये 
विशाल लोकतंत्र भारत वर्ष कहिये !!
 - सुलभ

Wednesday, May 11, 2011

सवाल बहुत है


स-वाल बहुत है
ब-वाल बहुत है

सोने की चिड़िया

कंगाल बहुत है
 

देश बंट न जाये
हड़ताल बहुत है

 
बांटते चलो ज्ञान
 अ-काल बहुत है




आँगन सिमट गया
दी-वाल बहुत है

  यारो ब्याह-शादी 

जंजाल बहुत है

'सुलभ' तेरे जेह्न
में
 भू-चाल बहुत है

 

Monday, March 28, 2011

एक नयी क्रान्ति की शुरुवात...

(कार्य की अधिकता के कारण पोस्ट पब्लिश करने में थोडा विलम्ब हुआ है.)
अमर शहीद भगत सिंह तो हमारे दिल में रहते हैं, जिन्होंने कहा था  "क्रांति का मतलब यह नहीं कि हम सिर्फ संघर्ष के लिए उत्प्रेरित करें और ना ही ये कभी किसी के व्यक्तिगत प्रतिशोध का माध्यम बने. यह बम और पिस्तौल का पंथ नहीं है. क्रांति इसलिए जरुरी है जहाँ से एक बेहतर नींव पर व्यवस्थित समाज के पुनर्निर्माणके लिए कार्यक्रम चलाये जाएं."

ये ऐसी बातें है जो मुझे सदैव प्रेरित करती है राष्ट्रहित में चिंतन करने एवं कुछ योगदान करने के लिए, फलस्वरूप हाल ही में मैंने कुछ गंभीर कार्य करने का मन बनाया है, अब उस दिशा में अग्रसर भी हूँ. "बातें बिजनस की" सीरीज को आगे बढाते हुए पोस्ट यहाँ प्रस्तुत है - हम हैं भारत के पढ़े लिखे मूरख नौजवान.


बहरहाल इस साल की होली भी यादगार रही. नए कार्यस्थल पर नए साथियों के बीच केवल शब्दों से होली खेली गयी. एक में दर्जन का मजा उठाया. आजकल हास्य लिखने की कोशिश करता हूँ तो मामला कुछ जम नहीं पाता. फिर भी एक सामयिक ताजा शेर आप सबकी ओर फेंकता हूँ.


"इन्टरनेट में फंसे और सरेआम हो गए
एक क्लिक किया और बदनाम हो गए
ख़त नोटिस समाचार बधाई विज्ञापन
इमेल के बौछार में सब स्पाम हो गए "
  - सुलभ 

Saturday, March 19, 2011

~~~वाह होली वाह~~~



सब से पूछ रहे हैं - आज तारीख केतना है, और कौन दिनवा होली है.
लेकिन कोई ब्लोगर कुछ बता नहीं रहा है. जब तक कोई बताता नहीं है तब तक हम यहीं बैठ के भांग घोटल लस्सी पीते रहेंगे. 


तब तक आप लोगन गीत सुनिए...

रंग भरी पिचकारी पिया
तुमने जो चलाई
अंग अंग भीग गया
रंगों से नहाई.
झूम रही बागों में कलियाँ
डाली डाली बौराई
मस्त फागुनी हवाओं की
गुनगुनाती होली आई
रंगों से सराबोर हुई
मेरी सूरत भोली
मैं तो तुमसे हारी 'सुलभ'
और न करो ठिठोली
प्रीत का रंग बरसाना
मेरे जीवन भर हमजोली
रहूँ सदा तेरी बाहों में
मिटे न प्रेम की रोली।


(~~~बधाई~~~बधाई~~~बधाई~~~)

Monday, March 7, 2011

शिकवे सारे मन के धो ले

आँखों से वे  जब भी बोले
राज वफ़ा के अपने खोले

दिल से दिल की बात हो गई 
चुपके  चुपके  धीमे  हौले

कैसे भूलूँ  अपना बचपन
चार आने के चार टिकोले
 
(मेरे छोटे शहर अररिया जिला की स्थिति )
फसलें सूखी,  भीगे सपने
बाढ़ से पहले बरसे शोले

पल में माशा पल में तोला 
एक इंसां के कई कई चोले

छोटी   छोटी  गजलों में  तू
सुंदर सुंदर शब्द पिरो ले

दुनिया भर के सुख को समेटे
देख साधू के सिर्फ एक झोले

बरसों बाद  मिले हैं  अपने
शिकवे सारे  मन के धो ले

हाले दिल 'सुलभ' लिक्खा कर  
पढ़ कर मन  तो हल्का हो ले ||



Sunday, February 27, 2011

बातें बिज़नेस की


जब किसी मरीज की तबियत मे कोई सुधार नही होता तब डाक्टर एक सलाह देते हैं जाईए किसी नए जगह पर कुछ दिन बिताईए नए लोगों से मिलिये, सब कुछ सही हो जाएगा. उदासियों के बादल छंट जाएंगे. कुछ भी खाना रुचेगा, अपने काम मे फिर से मन लगने लगेगा. मतलब आपकी जिंदगी खुबसूरत हो जायेगी. ये बात बिलकुल सही है मैने खुद पर आजमाया और सफल हुआ.

पिछले तीन चार सालों मे पढाई, मनोनुकूल नौकरी की तलाश, सुंदर भविष्य निर्माण के चक्कर मे आफिस और निवास के बहुत से जगह बदले. इस दौरान २०-३० के युवाओं  के बीच ज्यादा समय गुजरा. दिल्ली (एन.सी.आर) मे जो एक बात हर जगह देखने को मिली वो ये कि ‍ ज्यादातर युवा महानगरीय जीवानशैली मे खुद को परफेक्ट रखने की कोशीश में ‍‍संघर्ष कर रहे है. सैटेलाईट चैनलों के दिखावे, बहकावे और प्रिंट व टेलीविजन विज्ञापणों के मायाजाल में गिरफ्त हैं. जो बेरोजगार है ऐसा लगता है उनके सामने विकल्पों की भारी कमी है. वे परेशान हैं एक अदद जॉब के लिये. वे अपना रिज्युमे कुछ खास सेक्टरों मे ही भेज रहे हैं जैसे आई.टी. (सोफ्टवेयर, हार्डवेयर, नेटवर्किंग ), फाईनांस (बैंकिग, इंसोरेंश, शेयर ट्रेडिंग), कालसेंटर, बी.पी.ओ  और अंत मे कोई बात न बने तब सेल्स एंड मार्केटिंग. स्वयं का बिजनेस शुरू करने का जोश या ख्याल न के बराबर!

जो युवा जॉब मे हैं उनकी दिनचर्या मे भी मानो विकल्पों की भारी कमी है. ऑफिस से शाम में तो कभी रात नौ दस बजे तक बाहर ही डीनर एंजोय करते हुये  थक कर आएंगे. थके हुये न भी हों तो भी बहुत थके होने का अहसास कराएंगे. पी.जी. मे अथवा फ्लैट में साथ रहने वाले रूममेट्स से कुछ ऐसी चर्चा करेंगे. "यार शादी से पहले सेक्स जरूरी है... तुम्हारी कैसी चल रही है... हां सिर्फ मोबाईल पर बातें होती है देखें कब तक वो हां करती है..." वैसे शादी का मूड किसी का नही हैं... कोई कहता है "मैं भी जाब चेंज की सोच रहा हुं... दो साल का इक्सपीरिएंस होने वाला है... पैकेज यहां बढ़ती है तो ठीक वर्ना कंपनीयों की कमी थोड़े है.... पूणे से भी एक काल आई हुयी है..." कोई एम.टी.वी. रोडीज देखते हुये कहता है "तू एक बार ट्राई कर जिंदगी मे एडवेंचर का मजा ले... यहां साली नाइट शिफ्ट बी.पी.ओं मे क्या रक्खा है..." कभी ये सुनने को मिलता  "अरे तू खाली डिनर पैक कर लाया, बीयर नही लाया! साले आज तुम्हारी ट्रीप है भूल गया..." तो कभी किसी संडे की शाम, "आज बारह बजे तक सोया हफ्ते भर की थकान मिटाई फिर कपड़े सपड़े धोये, द चीकन लीकन(नॉएडा का एक रेस्टोरेंट ) वाले से लंच मंगवाया, लैपटोप पे वाल स्मिथ की मूवी इंडीपेंडेंस डे देखा. तुमने क्या किया सारा दिन..." "मैं तो ईवेंट पे गया था गुड़गावं एम्बीयेंस माल वहाँ रीयल एस्टेट की एक बडीं क्लाईंट से मिलना था. कंपनी ने मेरे को भेजा था डरते डरते प्रेजेंटेशन दे कर आया हूँ. अगर डील फाईनल हो गयी तो समझो तुम लोगों को जानी वाकर पिलाउंगा तुम लोगों ने तो सिर्फ नाम ही सुना होगा न..." "चल तू ज्यादा मत बोल मुझे भी  क्लाईंट ऑफ़र करते हैं... ...! " ... !!   

"और बॉस आपकी कैसी चल रही है?" किसी ने मेरे उपर ईशारा किया. (ये भी एक फैशन है अपने अगल बगल रहने वाले साथियों को संबोधित करने का ). "..अरे इनसे मत पुछो ये कवि आदमी हैं, देश को सुधारने की बात  करते हैं. कल नाईट में बस एक ग्लास बियर लेने के बाद ही शुरू हो गए. कोई सोसायटी संगठन बनाने की बात कर रहे थे. हमारे तो भेजे से ऊपर निकला गया. ये इंटरनेट पर कविता लिखते हैं. भइये  खुद को बदल डालो यही बहुत है. देश तो भगवान् भरोसे चल रहा है जैसे कि अपनी जॉब पता नहीं कब निकाल दिया जाये."  किसी दुसरे ने टोका "यू मीन ब्लोग? येस येस! ...गुड डैट इज गुड हाबी. आई एम अलसो राईटिंग ब्लोग. माई सबजेक्ट इज स्मार्ट एंभेस्टमेंट इन फलाक्चुयेट  मार्केट."

मैं जवाब में बस इतना ही कह पाया "तुमने ठीक कहा खुद को बदल डालो यही बहुत है, देश अपने आप सुधर जायेगा. वैसे मेरा यहाँ खूब मन लग रहा है. सोफ्टवेयर कंसल्टेंसी के फील्ड में हूँ, मंडे टू फ्राइडे ऑफिस ड्यूटी. रविवार को साफ़ सफाई, मिलना मिलाना या पोस्टें पढना, (कविता, ग़ज़ल, हास्य, कुछ भी) लिखना. एक दिन सेटरडे को बिजनेस (स्वयं को बिजी रखने) की प्लानिंग करता हूँ. और हाँ एक गुड न्यूज है. मैंने अपना बिजनेस का रजिस्ट्रेशन करा लिया है. अब तो बिजनेस को हलके में नहीं लूँगा." जैसे पिछले दो साल से करता आया था. फिर किसी ने टोका "बाय द वे आप करना क्या चाहते हैं?" मैंने बोला "छोटा मुंह बड़ी बात. मैं अपने जीवन में एक लाख युवाओं को बिजनेस ट्रेनिंग देना चाहता हूँ जिसमे ज्यादातर भारतीय युवा हों जहां वे स्वयं के बनाए हुए विदेश के क्लाइंट्स को इन्टरनेट पे डील करें और आत्मविश्वास से ये बोलें कंपनी अगर जॉब से निकाल भी दे तो कोई फिकर नहीं अपना साईड बिजनेस से खर्चा निकलता रहेगा  "  (शेष अगले भाग में जारी...)

ये पोस्ट विशेष कर मैंने 20 से 30 के युवाओं के लिए लिखा है. बाकी सभी नए पुराने ब्लोगर साथियों के लिए जिनके मेल आते रहते हैं बड़े स्नेह से पूछते हैं सुलभ कुछ नया नहीं लिख रहे हो. अभी कल ही नोएडा के फ्लावर एग्जिबिशन में गया हमारे पी.जी. के पास वाले स्टेडियम में ही लगा है, बहुत तरह के फूलों और केक्टस के पौधे देखे. बोनसाई ने विशेष आकर्षित किया (देखें चित्र ).







चलिए कुछ पंक्तियाँ पेश है....

रौनके महफ़िल में मुश्किलात पेश करते हैं
 
उलझे उलझे से हम
ख्यालात पेश करते है
कोई रो रो कर अपने जज़्बात पेश परते हैं
हम हँसते हुए मुकम्मल हालात पेश करते हैं

- सुलभ

Friday, December 31, 2010

उल्लेखनीय संकल्प !

मेरे लिए नववर्ष का आरम्भ एक गंभीर चिंतन का अवसर होता है. हर नये साल में बधाइयों एवं शुभकामनाओं के बीच एक संकल्प भी लिया जाता रहा है. लिए गए संकल्पों के बाद क्या हमने अपनी बिखरी शक्तियों का संचय कर उचित दिशा में इसका प्रयोग किया है? यह सवाल भी कभी कभी हमारे चिंतन  का विषय होता है, परन्तु यह हर वर्ष हो इसकी गारंटी नहीं है.
जैसा कि अधिकांश ये होता आया है "संकल्पों पर दृढ़ता से कायम न रहना", और यही हुआ भी. आज तीन साल बाद फिर एक दृढ संकल्प लेने और उनपर सख्ती से अम्ल करने की जरुरत महसूस हो रही है. इसका मतलब साफ़ है आने वाले वर्ष में एक श्रमजीवी के रूप में कुछ उल्लेखनीय कार्य करने ही होंगे.

यह तो हुई मेरी बात. जो कि तय है मैं अवश्य करूँगा. अब बात करते हैं कुछ औरों की, जिन्होंने इस मौके पर कुछ अच्छे संकल्प लिए हैं (?)

पाकिस्तान - " हम संकल्प लेते हैं आइन्दा अमेरिका से कोई मदद नहीं  लेंगे, हमें इसकी जरुरत नहीं होगी क्यूंकि चीन ने भारतविरोधी अभियानों में मदद करने का वादा किया है"

अमेरिका - "हम अपने पैसो और ताकतों का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ लोकहित में कल्याणकारी योजनाओं में  करेंगे. युद्ध से हमारा कोई रिश्ता नहीं होगा. हाँ दुनिया भर के देशो में उनके किसी विवादों के बीच मध्यस्थता करने वाले एजेंटों को उचित पारिश्रमिक  देते रहेंगे. भारी मेहनताना सिर्फ उन्ही एजेंटों को मिलेगा जो  विवादों को जीवनभर निभायेंगे"

मनमोहन सिंह - "मैं संकल्प लेता हूँ अब नए साल से अपने देशवासियों को कोई शिकायत का मौका नहीं दूंगा. मैं अपनी चुप्पी तोरुंगा, किसी भी मामले में कोई भी ब्यान देने से पहले मैं सोनिया जी से परामर्श नहीं लूँगा. मैं सिर्फ राहुल बाबा से अनुमति लेना जरुरी समझूंगा"
********************************************************

आप सभी ब्लोगर साथियों के लिए नया साल शुभ और प्रगति-दायिनी हो. हार्दिक शुभकामनाएं !!!


- सुलभ

Sunday, November 7, 2010

दास्ताँ-ए-इश्क दौरान-ए-ग़ज़ल

युनिवर्सल ट्रूथ की तरह कुछ पंक्तियाँ अजर अमर है, जैसे ये शेर  "ये इश्क नही आसां इतना समझ लिजिये, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है." जहाँ इश्क इबादत है वहीं कुछ परंपराएं भी हैं.
इन दिनो ग़ज़लों का मौसम है, मन मे उत्साह है. प्रस्तुत है कुछ पंक्तियां जिसे "दास्ताने इश्क दौराने ग़ज़ल" कह सकते हैं.


तोबा  ये  तकरार  की बातें
इश्क मे जित-हार की बातें


हुस्न शोला, है अदा कातिल
इश्क  मे  हथयार की बातें


जिगर यारों थाम के रखना
इश्क  मे  इन्कार की बातें


जुबाँ चुप औ' दिल है बेकाबू
इश्क मे  इज़हार की बातें


सोना चाँदी  ना मोती मूंगा 
इश्क  मे दिलदार की बातें


वफ़ा  वादे  दोस्ती  कसमे
इश्क  मे ऐतबार की बातें


सनम की यादे गमे-जुदाई
इश्क मे इंतजार की बातें


सितमग़र जुल्मी बेवफाई
इश्क मे  हैं ख़ार की बातें


लैला मजनूँ फ़रहाद शीरी
इश्क में किरदार की बातें


 - सुलभ 

Thursday, November 4, 2010

आधे अधूरे दीये जलते

लोकतंत्र की रखवाली मे
नेता व्यस्त  दलाली मे

चुनावी  मुद्दे  गौण हुये
लफ्फाजी और गाली मे

ज़ज सी.बी.अई पानी भरते
सत्ता  की कोतवाली  मे

खुन-पसीना पेशाब बराबर
भ्रष्टाचार  की  नाली मे

दुश्मन  वही सबसे बड़ा
जो करते छेद थाली मे

आधे अधूरे दीये जलते
महंगी होती दीवाली मे
***


(आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं! - सुलभ )


लिंक विदइन

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जिंदगी हसीं है -
"खाने के लिए ज्ञान पचाने के लिए विज्ञान, सोने के लिए फर्श पहनने के लिए आदर्श, जीने के लिए सपने चलने के लिए इरादे, हंसने के लिए दर्द लिखने के लिए यादें... न कोई शिकायत न कोई कमी है, एक शायर की जिंदगी यूँ ही हसीं है... "