रौनक-ए-गुलशन की ख़ातिर अज़ल लिख रहा हूँ
ख्वाईश इन्किलाब की है मुसलसल लिख रहा हूँ।
सब कुछ लूट चुका था बस्तियां वीराँ थी
बेमतलब हुआ क्यूँ फिर दखल लिख रहा हूँ।
आवाजों के भीड़ में मेरी आवाज़ गुम है
अल्फाजों को मैं अपने बदल लिख रहा हूँ।
बेबस आँखों में शोले से उफनते हैं
अंधेरे में हो रही हलचल लिख रहा हूँ।
उम्मीद इस दिल को फिर से तेरा दीदार हो
ख्यालों में तेरे खोया हरपल लिख रहा हूँ।
बेहद खौफ़नाक मंज़र है और क्या बयां करूँ
खामोश जुबां से इक ग़ज़ल लिख रहा हूँ।
अज़ल = beginning
मुसलसल = बार-बार, निरंतर
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Friday, December 5, 2008
खामोश जुबां से इक ग़ज़ल
Online in Hindi Posted by (Sulabh Jaiswal)
Sulabh Jaiswal "सुलभ"
समय
11:13 AM
4
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