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अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारमनसानां तु वसुधैव कुटुंबकम्
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Wednesday, May 11, 2011

सवाल बहुत है


स-वाल बहुत है
ब-वाल बहुत है

सोने की चिड़िया

कंगाल बहुत है
 

देश बंट न जाये
हड़ताल बहुत है

 
बांटते चलो ज्ञान
 अ-काल बहुत है




आँगन सिमट गया
दी-वाल बहुत है

  यारो ब्याह-शादी 

जंजाल बहुत है

'सुलभ' तेरे जेह्न
में
 भू-चाल बहुत है

 

Monday, March 7, 2011

शिकवे सारे मन के धो ले

आँखों से वे  जब भी बोले
राज वफ़ा के अपने खोले

दिल से दिल की बात हो गई 
चुपके  चुपके  धीमे  हौले

कैसे भूलूँ  अपना बचपन
चार आने के चार टिकोले
 
(मेरे छोटे शहर अररिया जिला की स्थिति )
फसलें सूखी,  भीगे सपने
बाढ़ से पहले बरसे शोले

पल में माशा पल में तोला 
एक इंसां के कई कई चोले

छोटी   छोटी  गजलों में  तू
सुंदर सुंदर शब्द पिरो ले

दुनिया भर के सुख को समेटे
देख साधू के सिर्फ एक झोले

बरसों बाद  मिले हैं  अपने
शिकवे सारे  मन के धो ले

हाले दिल 'सुलभ' लिक्खा कर  
पढ़ कर मन  तो हल्का हो ले ||



Sunday, November 7, 2010

दास्ताँ-ए-इश्क दौरान-ए-ग़ज़ल

युनिवर्सल ट्रूथ की तरह कुछ पंक्तियाँ अजर अमर है, जैसे ये शेर  "ये इश्क नही आसां इतना समझ लिजिये, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है." जहाँ इश्क इबादत है वहीं कुछ परंपराएं भी हैं.
इन दिनो ग़ज़लों का मौसम है, मन मे उत्साह है. प्रस्तुत है कुछ पंक्तियां जिसे "दास्ताने इश्क दौराने ग़ज़ल" कह सकते हैं.


तोबा  ये  तकरार  की बातें
इश्क मे जित-हार की बातें


हुस्न शोला, है अदा कातिल
इश्क  मे  हथयार की बातें


जिगर यारों थाम के रखना
इश्क  मे  इन्कार की बातें


जुबाँ चुप औ' दिल है बेकाबू
इश्क मे  इज़हार की बातें


सोना चाँदी  ना मोती मूंगा 
इश्क  मे दिलदार की बातें


वफ़ा  वादे  दोस्ती  कसमे
इश्क  मे ऐतबार की बातें


सनम की यादे गमे-जुदाई
इश्क मे इंतजार की बातें


सितमग़र जुल्मी बेवफाई
इश्क मे  हैं ख़ार की बातें


लैला मजनूँ फ़रहाद शीरी
इश्क में किरदार की बातें


 - सुलभ 

Friday, May 28, 2010

शुरू करो उपवास रे जोगी



जब तक चले श्वास रे जोगी
रहना नज़र के पास रे जोगी

बंधाकर सबको आस रे जोगी 

कौन चला  बनवास रे जोगी

हर सू फ़र्ज़ से सुरभित रहे

घर दफ्तर न्यास रे जोगी

सदियों तक ना प्यास जगे

यूँ बुझाओ प्यास रे जोगी

टूटे हिम्मत फिर से जुड़ेंगे

खोना मत विश्वास रे जोगी

जो भी पहना दिखता सुन्दर

तहजीब का लिबास रे जोगी

वही  पुराने  भाषण मुद्दे
कुछ भी नहीं ख़ास रे जोगी

प्याज-चीनी सब महंगा है
शुरू करो उपवास रे जोगी

-सुलभ

Saturday, April 24, 2010

तोहरा से नज़र मिलाईं कईसे (भोजपुरी ग़ज़ल)


देखाईं कईसे  जताईं कईसे
हमरो अकिल बा बताईं कईसे

नासमझ के समझाईं कईसे

आँख खुलल बा जगाईं कईसे

अकेले सफ़र में गाईं कईसे

उदास मन बा  खाईं कईसे

घाव करेजा के छुपाईं कईसे

पुरनका याद  भुलाईं कईसे

  तोहरा से नज़र मिलाईं कईसे

'सुलभ' झूट शान देखाईं कईसे 

(अकिल=अक्ल, करेजा=दिल)

Thursday, March 11, 2010

दर्द अपना मिल कर बाँट लेंगे


दर्द अपना मिल कर बाँट लेंगे
ये जिंदगी प्यार से काट लेंगे

ज़रा आसमान से उतर कर देखो
खाई गहरी नहीं है पाट लेंगे

सब अपने ही खेत से निकले हैं
जो सड़े हैं उनको छांट लेंगे

राजा कबतक महल में टिकेगा  
(दिखावा कबतक चेहरे पे टिकेगा)
वक़्त के दीमक सब चाट लेंगे 
 - सुलभ

Friday, February 5, 2010

उठो सुबह हो चुकी चमक रहा आफताब देखो


इससे पहले कि गीली आँखों में तेज़ाब देखो 
होश में आओ रहनुमाओं वर्ना इंकलाब देखो


हक़ मार जाते हो
तुम अपने ही खिदमतगार के
रगों में इसके खून नहीं  सुलगता अलाव देखो


जंगल पहाड़ उजाड़ कर ये कैसी तरक्की
पाई है
चार दिन कि जिंदगी में कुदरत के सौ अज़ाब देखो


जमीन मकान आसमान सब यहाँ बेमानी है
हवा पानी को तरस रहे शहर बेहिसाब देखो


महफ़िल कैसे सजे यहाँ तेल खरीदने की कूबत नहीं
महंगाई के आगे हार गए कितने रईस नवाब देखो


सच को झूट बनाने का खेल और नहीं खेल सकते 
प्यार भरे तिरे सवाल के आगे हम हुए लाजवाब देखो 


खोल दो बंद दरवाजे खिड़कियाँ औ' रोशनदानों को
उठो सुबह हो चुकी चमक रहा आफताब देखो ||
***



Friday, January 15, 2010

इजहारे जज़्बात की ज़हमत कीजिये






इजहारे जज़्बात की ज़हमत कीजिये
मोहब्बत की है तो हिम्मत कीजिये

खुदा के रहमत से कायम मोहब्बत
सजदे में सर रख
इबादत कीजिये

मोहब्बत की मंजिल है इम्तहान लेगी
ना उफ़  ना कोई  शिकायत कीजिये


माना
की मोहब्बत में खामोश है जुबाँ
चाहें तो निगाहों से शरारत कीजिये

रंजिश  साज़िश  हिमाकत  नफ़रत
मोहब्बत के दुश्मन हैं
खिलाफत कीजिये 


मोहब्बत मोहब्बत मोहब्बत मोहब्बत
हर शख्स को मिले ऐसी चाहत कीजिये




दूर दिलों तक पहुंचे 'सुलभ' तेरे अलफ़ाज़
मोहब्बत में यारो खतो-किताबत कीजिये



- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'

Monday, December 28, 2009

इस जमाने के अन्दर तो जमाने बहुत हैं



अनजान शहर में मिले खजाने बहुत हैं
खेल किस्मत को अभी दिखाने बहुत हैं

हर कदम टूटते हैं सैकडो दिल यहाँ
टूटे बिखरे दिलों के अफ़साने बहुत हैं

कुर्सी के पिछे दौड़कर सभी बावले हुए
इक नाजनीन के देखो दीवाने बहुत हैं

नक़ाब बदल बदल कर जो करते हैं घात
उनको ढुढेंगे कहाँ जिनके ठिकाने बहुत हैं

शायद चलती रहे महफिल देर रात तक
तेरे सामने साकी अभी  पैमाने बहुत हैं

पत्थरों से मुलाक़ात अब रोज़ की बात है
आँखों ने भी बसाए ख्वाब सुहाने बहुत हैं

किस किस की दास्ताँ सुनोगे तुम 'सुलभ'
इस जमाने के अन्दर तो जमाने बहुत हैं

- सुलभ जायसवाल

Saturday, December 19, 2009

वो हंस दिए हमारी नादानी देखकर - एक कचोटती ग़ज़ल






हैरत में हैं लोग सचबयानी देखकर 
 दो गवाह और झूटी कहानी देखकर  


लिख सजा बेगुनाह को कलम है शर्मशार 
फैसले हुए हैं  कागज़ कानूनी देखकर   


ख्वाहिशों कि उड़ान अभी बाकी है बहुत 
मियाँ घबरा गए ढलती जवानी देखकर 



जाने क्या देखकर जाने क्या सोचकर  
फूल मुरझा गए सख्त निगरानी देखकर  


वहां न कोई भेड़िया था न कोई दरिंदा    
गुड़िया रोई थी चेहरा इंसानी देखकर  


खालिश डिग्री दिखाकर मांगी थी नौकरी
वो हंस दिए हमारी नादानी देखकर 


सुबह चल निकला था घर से प्यासा ही
राहत मिली अब रस्ते में पानी देखकर 
***


मुझे माफ़ कीजिये ! मैं कोई शायर नहीं हूँ 
शे'र पढता हूँ आपकी मेहरबानी देखकर


- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'



Friday, December 11, 2009

टिप्पणी कीजिये खूब कोई शरारत ना कीजिये - ग़ज़ल


जैसा की आप सभी जानते हैं पिछले एक महीने से अपने प्यारे ब्लॉगजगत में कुछ उलजलूल हरकतें और अनावश्यक बहसे हुई हैं. दुखी होकर मैंने एक Post जारी किया था "शान्ति के लिए यह सन्देश आत्मसात करें " बहुतों ने इसकी सराहना की तो कुछ ने असहमति जताते हुए अपना पक्ष रहा जवाब में मैंने भी यथोचित बहस " मानवता के दुश्मन ब्लोगिंग से दूर रहें." कर मामले को नतीजे पर पहुंचा कर सभी से जिम्मेदार लेखन की अपील की. 

एक खबर सुन पढ़कर आज फिर मर्माहत हो गया हूँ. अब क्या करूँ न चाहते हुए भी आज एक  ग़ज़ल (अपने सतरंगी अंदाज से अलग) कुछ इस तरह कहना पड़  रहा है - 




इजहारे- खुराफात की  ज़हमत ना कीजिये  
खो जाये अमन-चैन ऐसी जुर्रत ना कीजिये  


जब ठेस लगे दिल पर शिकायत दर्ज कीजिये 
बहस कीजिये खुल कर अदावत ना कीजिये 


कलम चलाने के लिए यहाँ मुद्दे भरपूर हैं 
महज दिखावे के वास्ते खिलाफत ना कीजिये 


ये भारत वर्ष है अपना गौरवशाली हिन्दोस्ताँ
जाति-धरम के नाम पर सियासत ना कीजिये



जरुरी नहीं जो दिखता है वो ही लिखता है  
इस्तकबाल लाजिमी है इबादत ना कीजिये 


ब्लॉगरी कोई खेल नहीं बस इतना ख्याल रहे  
टिप्पणी कीजिये खूब कोई शरारत ना कीजिये 

- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'  

Sunday, December 6, 2009

राह चलते एक छोटी सी ग़ज़ल




आंधियां जब तेज रही थी
टहनियों में खलबली थी

दरख़्त वही जगह पर रहे
जड़े जिनकी खूब गहरी थी

खुद को घायल पाया हमने
हुस्न से जब नज़र मिली थी

एक मुलाक़ात में दिल दे बैठे
नाजनीन वो  बड़ी हसीं थी 

सुबह तक डूबा रहा सूरज
जाड़े की एक रात बड़ी थी

सब ने  अपने  होश गंवाये 
ऐसी तो उसकी जादूगरी थी 

तंग गलियों से जब मैं निकला
देखा तब  एक सड़क खुली थी


- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी' 
(लेखक को gazal बहर की जानकारी का अभाव है)

Saturday, November 28, 2009

मेरी याद में देखना परीशाँ तुम होगे - ग़ज़ल

भी हाल ही में मेरे किसी शुभचिंतक ने मुझे मुफ्त की सलाह बांटने पर अपनी नाराजगी जाहिर की है. मैं परेशान, आख़िर मान लिया की गलती मेरी ही है. जाने अनजाने कुछ शे' लिखे चले गए. आज की यह ग़ज़ल उसी शुभचिंतक के नाम पेश है -






अपनी जमीं के वास्ते आसमां तुम होगे
करोगे जुर्म कोई तो गवाह तुम होगे

बातबात पे ऐब ढूंढ़ना अच्छी बात नहीं
आइना जब देखोगे पशेमाँ तुम होगे

सलाह लाख दुरुस्त हो फिजूल मत बांटो
बदनाम एक दिन ख्वामखाह तुम होगे

फूलों के बीच बैठे हो काँटों से दिल लगाओ
मुमकिन है इस बाग़ के बागबाँ तुम होगे
ये माँ की दुआएं हैं कभी साथ न छोड़ेगी
साया तुम्हारा होगा वहां जहाँ तुम होगे
अपने माज़ी को हम भुला नहीं पाये हैं
मेरी याद में देखना परीशाँ तुम होगे ॥

(पशेमाँ = शर्मिंदा, माज़ी = अतित )

- सुलभ

Sunday, September 20, 2009

चाँद भी सजदे में है (ग़ज़ल)

आज रमजान का महिना भी गुजर गया और दशहरा प्रगति पर है। घर से दूर अकेले नए जगह में त्यौहार के रोमांच का पता न चला। हाँ यदि घर पर होता तो ईद साथियों के साथ खूब जमती । ख़ैर आज इस मौके पे आप सभी के खिदमत में एक ग़ज़ल अर्ज़ करता हूँ।

रं ओ गम अपने सारे भुला दो भाई
किसी से नफरत नही है बता दो भाई।

अपने वतन के वास्ते कितने वफादार हैं
राह में आए गद्दारों को यह दिखा दो भाई।

जब गूंजती हो शहनाई पड़ौसी के आँगन में
गीत तुम भी एक कोई गुनगुना दो भाई ।

झूटे नही थे बचपन की सेवइयां और मेले
गले लगके चाचा के अदावतें मिटा दो भाई।

बेहद पाक मंजर है, चाँद भी सजदे में है
शम्मा मुहब्बत का तुम भी जला दो भाई।।


Wednesday, September 2, 2009

इक जरूरी सवाल मियाँ (ग़ज़ल)


ज़रा भीड़ से हट कर तो देखो हाल मियाँ
तेज बहुत हो गयी है जमाने की चाल मियाँ

बेइंतिहा लगे हैं दौर में बाजारों को समेटने
पर घर में नहीं महफूज़ किसी का माल मियाँ

सियासत में कदम रखा और जादूगर बन गए
दिखा रहे हैं एक से बढ़कर एक कमाल मियाँ


कितने छाले पड़े हाथों में अब दिखा रौनके-ए-चमन
एक फूल आज तोड़ी तो उस पे हुआ बवाल मियाँ

अब चराग ढूँढता हूँ के थोड़ी रौशनी मिले
अँधेरे में खो गया इक जरूरी सवाल मियाँ

लिंक विदइन

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जिंदगी हसीं है -
"खाने के लिए ज्ञान पचाने के लिए विज्ञान, सोने के लिए फर्श पहनने के लिए आदर्श, जीने के लिए सपने चलने के लिए इरादे, हंसने के लिए दर्द लिखने के लिए यादें... न कोई शिकायत न कोई कमी है, एक शायर की जिंदगी यूँ ही हसीं है... "