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अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारमनसानां तु वसुधैव कुटुंबकम्
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Wednesday, August 31, 2011

हम जाग रहे हैं


   जिस महान संत के विचारों से मेरे व्यक्तित्व में जो भी न्यूनाधिक या उल्लेखनीय विकास हुआ है  वो हैं स्वामी विवेकानंद.  उनके आह्वान अनिवार्य रूप से आधुनिक मनुष्य के लिए एक मंत्र है. विवेकानंद जी ने जीवन पर्यंत "आत्म जागरण" पर बड़ा जोर रखा, तथ्य यह है कि आप निरंतर जाग रहे हैं और उन्नति की ओर प्रशस्त हैं.  समस्त समाज के उत्थान के लिए चिंतित हैं, प्रयासरत हैं . जागना और जगाना है अपने भीतर के स्व की सुंदरता के लिए.  वसुधैव कुटुम्बकम के लिए.


उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक अपने लक्ष्य तक ना पहुँच जाओ.
Arise, Awake, and Stop Not Till the Goal Is Reached!


 

लिंक विदइन

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जिंदगी हसीं है -
"खाने के लिए ज्ञान पचाने के लिए विज्ञान, सोने के लिए फर्श पहनने के लिए आदर्श, जीने के लिए सपने चलने के लिए इरादे, हंसने के लिए दर्द लिखने के लिए यादें... न कोई शिकायत न कोई कमी है, एक शायर की जिंदगी यूँ ही हसीं है... "