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अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारमनसानां तु वसुधैव कुटुंबकम्

Friday, February 26, 2010

होली में ठिठोली > एक से बढ़कर एक बुढऊ > रंग बरसे



आदरणीय महाबीर शर्मा, प्राण शर्मा, मंसूर अली हाशमी, डा. श्याम सखा, तिलक राज कपूर, नीरज गोस्वामी, आचार्य संजीव 'सलिल', सर्वत जमाल, राज भाटिया,राजेश चेतन, राज सिंह, समीर लाल, राकेश खंडेलवाल और स्नेही गुरु पंकज सुबीर जी के चरणों में यह पोस्ट समर्पित करता हूँ...


पिछले साल ब्लोगरों के साथ होली खेला तो था पर थोड़ी व्यस्तता और परेशानियों के बीच. इस बार पूरा फुल्टू टाइम है. आजकल हरियाणे में हूँ, उधर तरही में भी डूब उतर रहा हूँ. होली शुरू करता हूँ इस कविता से, 



मन मोरा झकझोरे छेड़े है कोई राग
रंग अल्हड़ लेकर आयो रे फिर से फाग
आयो रे फिर से फाग हवा महके महके
जियरा नहीं बस में बोले बहके बहके
चहुँ ओर सुनो ढोलक तबले का शोर
शहनाई और मझीरे में खूब ठनी होड़
खूब ठनी होड़ भंग के साथ ठंडाई
बौराया देवर खाये आज सुपारी पे मिठाई
प्रेम की पिचकारी चलेगी आज कोई गैर नहीं
घुसो पड़ोसी के रसोई में अब कोई बैर नहीं


सबसे पहले तो यह बता दूँ , हम जैसे नौजवानों को ब्लॉगजगत(और काव्य-साहित्य ग़ज़ल मंच पर) में जिन बुजुर्गों का निरंतर आशीर्वाद मिल रहा है. हम ह्रदय से आभारी है. इस बार की होली गुरुजनों और ग़ज़ल बुढऊ को समर्पित है...



सतरंगी महफ़िल में होलियाने आ रहे हैं एक से बढ़कर एक बुढऊ, मेरे गुजारिश पर सब ने एक लोटा भांग पी है, दो-चार कद्दू बड़ा और एक मगही पान की गिलोरी चबाये हैं... और कुछ इस तरह फरमाए हैं...

 राज भाटिया

लाल हरा पिंक गोल्डेन कलर
आ मल दूँ तुझे जर्मन सिल्वर
होली है एssss

(विशेष नोट: मुझे शिकायत है, होली के उन हुरदंगो से जो रंग फेकते समय यह ख्याल नहीं रखते की सामने कोई बुजुर्ग, वृद्ध, अपाहिज या बीमार भी हो सकता है.)


नीरज गोस्वामी 

सुनो मेरी छैलछबिली मैं हूँ तेरा  दीवाना 
ग़ज़ल लिखे तेरे याद में अब कैसे समझाना
चल बाहर आ रंग डालूं तुझको जी भर के
खूब कमर हिलाएंगे जब तू गावेगी गाना




होली की सबको गोबड़ सहित बधाई
खाकर गुझिया पान भौजी भी बौड़ाई
गाओ मिलकर फाग 'सुबीरा' बजे ढोल तबले
नाचेंगे हम भी ठुमक के थोड़ी भंग तो चढ़ ले 


हे मनमोहिनी मंदाकिनी
तू मुझको रंग लगाती जा
तेरे हम आशिक पुराने
मुझसे ताल मिलाती जा
मैं जबतक गीत लिखूं गोरी
तू तब तक भांग पिलाती जा 


महाबीर शर्मा

अपनी ग़ज़लों में रवानी अभी बहोत है
बूढी हड्डियों में जवानी अभी बहोत है
देखना है तो जाओ लन्दन में देखो
'महाबीर' की वहाँ दीवानी अभी बहोत है
जोगी जी बोलो सररर सर्र ssss 



श्याम सखा 'श्याम'

रोहतक नगरी गुंजत है 
बुढ़उ के कमर डोलत है
ग़ज़ल के बहाने खेलत है
दृश्य मनोहारी होवत है
जब राधे संग हो 'श्याम'
 

तिलक राज कपूर "राही"

शायरी अदब की बोले हंसके 
भागो अपनी इज्ज़त लेके
आज ग़ज़ल को हज़ल बनाया
'राही' तुम होरी में बहके


 राजेश चेतन

हैप्पी न्यू इयर - सिखा गए अँगरेज़ 
वेलेंटाइन डे - छा गए अँगरेज़
ले दे के एक होली बची है
जी भर के मनाओ आज
गाओ सखाओं मिलकर फाग 
बोलो जी सररर सर्र ssss 

आग लगे पछमी संस्कृति में
हम रंग खेलेंगे हिन्दी में
बोलो जी सररर सर्र

 दिनेशराय द्विवेदी (वकील साब) 
ससुर ज़ज है, दरोगा मेरा साला
आ खोल दूँ तेरे किस्मत का ताला
होली में गिरा दो सारे कानूनी विकेट
पीछे खड़ा है तेरा सीनियर एडवोकेट

जोगी जी सररर्रा सर्रSSS रSSS


लाल लाल पियर पियर रंग के बहार बा 
दिल्ली डोलत बम्बई हिलत झुमत बिहार बा 
ढोल तबला हारमोनियम गीत गुंजत फाग के 
सम्हत होली जलाये 'सलिल' रात भर जाग के  




हम हैं असली मुम्बैया
नाचेंगे ता ता थैया
हाथी घोड़ा पालकी
जय हो विक्रम साल की
(होरी चा हार्दिक शुभेच्छा)



होली में न हमें सताओ
जल्दी से ताड़ी पिलाओ
जब तक हम न बहकेंगे
शे'र कहाँ से निकलेंगे 

अचानक मंच पे आ गयी हैं, बिना बुलाये हमारे चिप(sorry चीफ)  गेस्ट
मल्लिका ए हिंद(उर्दू अदब)

जब तक रही मै तसकीने-हयात  
कह न सके तुम अपने जज़्बात
रंग मोहब्बत के आज लगाओ    
अबके होली में बन जाये बात  
तमाम हाजरीन को होली की मुबारकबाद  


 मनोज

अपनी डफली अपना राग
पीके भांग झूमो आज 
हे 'मनुज' होली गाओ
समस्तीपुरी रंग बरसाओ 




समीर लाल (उड़न तश्तरी)

उड़े रंग लाल हरी
अबके होली में
उड़े 'उड़न तश्तरी'
अबके होली में
टिप टिप रंग चुए
अपने ब्लॉगनगरी से
हिन्दी से 
अंग्रेजी डरी
अबके होली में



टी. एस. दराल

बचनाsss ऐ हसीनो
लो मै आ गया sss
रंग का खिलाड़ी 
भंग का पुजारी
आज मचाउंगा भुचाआssssल
नाम है मेरा डाक्टर दराssssल



माशा अल्लाह! क्या सीन !!
जिसको देखो वही रंगीन
बूढ़े में झलके जवानी 
मुबारक हो सबको होली
ये परंपरा बहुत पुरानी

* * *
बुरा न मानो होली है 

 धन्यवाद ज्ञापन: 
इस कार्यक्रम में संगीत दिया - गुंडों के सरदार गौतम राजरिशी (कश्मीर से)
मंच संचालन किया - सुटठामार सुलभ अढाई कोट वाला (अररिया कोर्ट से)
मंच संयोजन  - दारुबाज दिगंबर नास्वा (दुबई से), रतजगा मवाली रविकांत (सीहोर से), पागल प्रकाश अर्श (दिल्ली से)

खिलान पिलान एवं रसोई प्रभार :
सरफुटोंवल संगीता पूरी
(मंगलग्रह से), रंगभंजना रंजना सिंह (टाटानगर से), छुर्मी अगरबत्ती बबली (हंसट्रेलिया से)
जन संपर्क और मीडिया प्रभारी : निर्मला खपरिला (नांगल से)
साउंड रिकार्डिंग एवं पोडकास्टिंग : अल्हड अल्पना वर्मा (अलईन से)
वीडियोग्राफी:  बतबन्ना कंचन चौहान (लखनऊ से) एवं  विषकन्या नीरा त्यागी (लन्दन से)
रंग और भांग का इंतजाम :रसभरी रश्मि प्रभा (पटना से), रचना विक्षिप्त  एवं खरंजू भाटिया (दिल्ली से), थरकीरत हीर (गौहाटी से)
रेडियो सूचना प्रभार : सरखुजानी श्रद्धा जैन (सिंगापुरी टावर से)  
दूरदर्शन प्रसारण : आशा जोरदेकर (अमरीका के सौजन्य से)

वाह होली वाह

Saturday, February 20, 2010

कॉपी पेस्ट करना सरल काम है


आज  के लिए अपनी कोई मौलिक रचना नहीं सो एक पुरानी कथा सुनाता हूँ...

क लोकप्रिय प्रेरक वक्ता अपने श्रोताओं का मनोरंजन कर रहा था,  उसने कहा: "मेरे जीवन का सबसे अच्छा साल वो था जो  मैंने एक औरत की बाहों में खर्च किया जो मेरी पत्नी नहीं थी!"

सभी श्रोता मौन रहे और एक दुसरे को सदमे भरे निगाह से देखने लगे. वक्ता ने आगे जोड़ा "और वह औरत मेरी माँ थी!" 


 जोरदार तालियां की गरगराहट और हंसी से हाल गूंज गया.
एक सप्ताह बाद, एक प्रबंधक जो अपने कार्यालय में उसी वक्ता को सुन चुका था, अपने घर पर
प्रभावी मजाक करने की कोशिश की.  नया नया प्रशिक्षित वह मैनेजर अतिउत्साहित होकर जोर से बोलने लगा... 
"मेरे जीवन का सबसे बड़ा साल वो जिसे
मैंने एक औरत की बाहों में खर्च किया जो मेरी पत्नी नहीं थी! "
तक़रीबन 3० सेकेण्ड खामोश रहने के बाद वो मैनेजर झुंझलाते हुए बोला "....और मुझे याद नहीं की वह कौन थी!"
पत्नी और घर के अन्य सदस्य भयानक गुस्से में आ गए.  



 

 कहानी का नैतिक सार: DON'T COPY IF YOU CAN'T PASTE !!



चलते चलते एक शे'र अर्ज है...

'इन्टरनेट' मतलब यायावरी का पर्याय
हम भी भटके खूब शब्द बीनते हुए 


Saturday, February 13, 2010

विल यु बी माय वेलेंटाइन

पश्चिम से आयातित यह पर्व शुरुआत में वहां उम्र दराज  लोग मनाते थे. बाजारवाद ने सब कुछ पलट कर रख दिया है. भारत में कदम रखने के साथ ही सैंट वेलेंटाइन डे, १४ फरवरी प्रेम दिवस बनकर छा गया. 

वेलेंटाइन एक  रोमन परिवार का नाम Valentinus, जो लैटिन शब्द(पुल्लिंग शब्द) valens, जिसका अर्थ है 'मजबूत और स्वस्थ' नाम से व्युत्पन्न है. " वेलेंटाइन रोमन कैथोलिक चर्च के कई संतों के नाम थे. सेंट वेलेंटाइन दिवस तीसरी सदी में एक शहीद के लिए नामित किया गया था. फ्रांस में यह लड़कियों के लिए भी प्रयोग में है. नाम का सामान्य स्त्री रूप Valentina है. जैसे "Will you be my Valentine" (क्या तुम मेरी महबूबा बनोगी?)  






पहली बार वर्ष 1999 में पटना प्रवास के दौरान मैंने VALENTINE DAY सुना था और उस समय वातावरण में इसके प्रभाव से परिचित कुछ लोगों को देखा था.
ख़ैर दो तस्वीरे हैं मेरा मतलब कवितायें हैं....

कभी लिखा था एक अंग्रेजी कविता जिसका हिन्दी अनुवाद भी जैसे तैसे साथ में दे रहा हूँ. देखिये कैसी रही.

Heartbeat high this moment.
And tongue keeps silent
Puzzles couldn't solved
Problems more involved
You feel when alone
 Voices heard unknown
   A soul comes your near
   Love starts with fear
   Environment looks nice
   New dreams float in eyes
   Thrill begins with new taste
   Its realize you to think best
   Nothing under your control
   Emotions failed to withdrawal
       Days and nights spent in past
       And today it is blast
       Yes, I am in Love...

अनुवाद: 

दिल की धड़कन उच्च इस क्षण
और जुबाँ रहता है बंद
पहेलियां बुझा नहीं सका
समस्याओं से परिचय हुआ
जब आप अकेले होते हैं
   
अज्ञात आवाजें सुनते हैं
  
कोई ख़ास आपके पास आता है
   
प्यार भय के साथ शुरू होता है
  
नज़ारे अच्छे लगने लगते है
   
नए सपने आंखों में तैरने लगते हैं
   
रोमांच नए स्वाद के साथ आता है
   
इसका एहसास बहुत ही भाता है
  
कुछ भी आपके नियंत्रण में नहीं होता
   
भावनाए पिछे हटने से इन्कार करती है
ढेरो दिन और रात चिंतन में बीते
और आज यह विस्फोट होता है
       
हाँ, मैं प्यार में हूँ ...
***


ख़ैर आज जो मैं बताना चाह रहा था, आधुनिकता से लबरेज बाजारवाद की, जहाँ बच्चे किशोर युवा सभी गिरफ्त में हैं... आफ्टर इफेक्ट्स आफ वेलेंटाइन  

EFFECTS OF IMPORTED VALENTINE DAY.


कच्ची उम्र के जोड़े घुमते लेकर हाथ अपने हाथ में  
चाँद सितारों कि सैर करते अक्सर ख्वाबो में रात में  

स्कूल-कालिजों में लगते दीवानी-दीवानों के मेले  
सुबह-शाम इश्क मोहब्बत खाली पीली बात में  

मैसेज मिसकॉल को कोडवर्ड बना गुफ्तगू करते हैं  
क्लासेज सारी पूरी करते मोबाइल लेकर हाथ में  

कॉफ़ी हाउस गिफ्ट हाउस सब इनसे गुलज़ार है  
मीटिंग तय पार्क में कभी लाइब्रेरी अहात में  

इल्मो तालिम कि हसरत ले नौजवाँ शहर को आये  
आशिक बन कर घूम रहे हैं गली गली दिन रात में 

***
 

- सुलभ


Friday, February 5, 2010

उठो सुबह हो चुकी चमक रहा आफताब देखो


इससे पहले कि गीली आँखों में तेज़ाब देखो 
होश में आओ रहनुमाओं वर्ना इंकलाब देखो


हक़ मार जाते हो
तुम अपने ही खिदमतगार के
रगों में इसके खून नहीं  सुलगता अलाव देखो


जंगल पहाड़ उजाड़ कर ये कैसी तरक्की
पाई है
चार दिन कि जिंदगी में कुदरत के सौ अज़ाब देखो


जमीन मकान आसमान सब यहाँ बेमानी है
हवा पानी को तरस रहे शहर बेहिसाब देखो


महफ़िल कैसे सजे यहाँ तेल खरीदने की कूबत नहीं
महंगाई के आगे हार गए कितने रईस नवाब देखो


सच को झूट बनाने का खेल और नहीं खेल सकते 
प्यार भरे तिरे सवाल के आगे हम हुए लाजवाब देखो 


खोल दो बंद दरवाजे खिड़कियाँ औ' रोशनदानों को
उठो सुबह हो चुकी चमक रहा आफताब देखो ||
***



लिंक विदइन

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जिंदगी हसीं है -
"खाने के लिए ज्ञान पचाने के लिए विज्ञान, सोने के लिए फर्श पहनने के लिए आदर्श, जीने के लिए सपने चलने के लिए इरादे, हंसने के लिए दर्द लिखने के लिए यादें... न कोई शिकायत न कोई कमी है, एक शायर की जिंदगी यूँ ही हसीं है... "